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बिहार विधानसभा चुनाव का पढ़ें इतिहास, जानिए बेहद दिलचस्प किस्से

1937 में बिहार विधानसभा का गठन हुआ था. लालू राज से लेकर सुशासन सरकार के रोचक सियासी खेल. जानने के लिए पढ़ें पूरी रिपोर्ट

News Nation Bureau | Edited By : Shailendra Kumar | Updated on: 27 Aug 2020, 11:03:19 AM
Bihar Assembly

बिहार विधानसभा (Photo Credit: फाइल फोटो)

नई दिल्ली:

बिहार का चुनावी समर सिर पर है. सियासी सरगर्मी बढ़ गई है. जनता दल यूनाइटेड(जदयू) और बीजेपी गठबंधन एक बार फिर सत्ता में वापसी करने की कोशिश में लगा है. सीएम नीतीश जो पूरे देश में सुशासन बाबू के नाम से जाने जाते हैं. इसबार उनके सामने कई चुनौतियां हैं. वहीं, बिहार पर 15 साल राज करने वाली लालू प्रसाद की पार्टी आरजेडी सत्ता में वापसी करने की पूरी कोशिश में लगी है. लालू के बेटे तेजस्वी यादव सीएम नीतीश कुमार के सामने खुद को सीएम पद चेहरा पेश कर रहे हैं. हालांकि, बिहार विधानसभा चुनाव बेहद ही दिलचस्प होता है. यहां पर चुनावी मौसम में नेता दल बदलते है. जो मौजूदा वक्त में शुरू हो गया है. दल बदल का खेल नेताओं का पुराना है. उतना पुराना जिताना पुराना बिहार विधानसभा का चुनावी इतिहास है. चलिए आपको बताते हैं बिहार विधानसभा चुनाव के इतिहास के बारे में. कब से बिहार में विधानसभा के चुनाव शुरू हुए. साथ ही कितनी बार विधानसभा का चुनाव अब तक हो चुका हैं.

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1937 में बिहार विधानसभा का गठन हुआ था
बिहार विधान सभा का गठन 1937 में हुआ था. उस काउंसिल के पहले चेयरमैन सच्चिदानंद सिन्हा थे. पहले स्पीकर हम दयालु सिंह चुने गए थे. गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट 1935 के व्यवस्थाओं के अनुसार जनवरी 1937 की अवधि में बिहार विधानसभा के चुनाव संपन्न हुए. 20 जुलाई 1937 को डॉ श्रीकृष्ण सिंह के नेतृत्व में पहली सरकार का गठन हुआ था. 22 जुलाई में से 30 को विधानमंडल का अधिवेशन हुआ. स्थापना के बाद ही विधानसभा में जनहित के कई महत्वपूर्ण फैसले लिए गए थे. हालांकि, 1952 में बिहार विधानसभा का पहली बार चुनाव हुआ था. जिसमें कांग्रेस सत्ता में आई. श्रीकृष्ण सिंह बिहार के पहले निर्वाचित मुख्यमंत्री बने और डॉ अनुग्रह नारायण सिन्हा राज्य के पहले उप मुख्यमंत्री के साथ सह वित्त मंत्री बने. 1952 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस और सोशलिस्ट पार्टी के अलावा 7 और पार्टियों ने चुनाव में हिस्सा लिया. जिसमें किसान मजदूर प्रजा पार्टी, झारखंड पार्टी, छोटा नागपुर और संथाल परगना जनता पार्टी, फॉरवर्ड ब्लॉक (मार्क्सवादी समूह), अखिल भारतीय राम राज्य परिषद, लोक सेवक संघ, अखिल भारतीय गणतन्त्र परिषद हैं. इसके आलवा कई निर्दलिय प्रत्याशियों ने भी चुनाव में लड़ा.

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1957 से 1980 तक विधानसभा चुनाव
25 फरवरी 1957 को बिहार विधानसभा के चुनाव का दूसरी बार चुनाव हुआ. विधानसभा में 264 निर्वाचन क्षेत्रों के लिए 1393 उम्मीदवारों ने चुनाव लड़ा था. एक बार फिर कांग्रेस ने बिहार में सरकार बनाई. इस बार कांग्रेस को प्रजा सोशलिस्ट पार्टी ने टक्कर दी. जो पहली बार चुनाव लड़ रही थी. छोटा नागपुर और संथाल परगना जनता पार्टी ने भी अपनी उपस्थिी दर्ज काराई. झारखंड पार्टी, भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी ने पहली बार बिहार के चुनाव में हिस्सा लिया था. बिहार विधानसभा 1962 के चुनाव नतीजों में एक बार फिर कांग्रेस पार्टी सबसे बड़ी पार्टी बन कर उभरी. पंडित बिनोदानंद झा ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. इस चुनाव में कुल 9 पार्टियों ने हिस्सा लिया. जिसमें कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी रही. स्वतंत्र पार्टी, जेएस जन संघ समेत एचएमएस हिंदू महासभा ने कांग्रेस के खिलाफ चुनाव लड़ा था.

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1969 के विधान सभा चुनाव में कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और हरिहर सिंह ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. इस चुनाव में तीन दलों ने 'ट्रिपल एलायंस' में चुनाव लड़ा. लोकतांत्रिक कांग्रेस दल, प्रजा सोशलिस्ट पार्टी और संयुक्ता सोशलिस्ट पार्टी. बिहार विधान सभा चुनाव 1972 में फिर कांग्रेस सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी और केदार पांडे ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. 19 मार्च 1972- 02 जुलाई 1973 तक. जिसके बाद अब्दुल गफूर 2 जुलाई 1973-11 अप्रैल 1975 तक बिहार के सीएम रहे. जिसके बाद जगन्नाथ मिश्रा ने 11 अप्रैल 1975-30 अप्रैल 1977 बिहार के मुख्यमंत्री बने. यह वो दौर था जब कांग्रेस बिहार में अपने चरम पर थी.

1977 के बिहार विधान चुनाव में जनता पार्टी ने जीत दर्ज की. सीएम के पद की शपथ कर्पूरी ठाकुर ने ली. यह वह वक्त था जब देश में इमरजंसी के बाद पहली बार चुनाव हो रहे थे. इस चुनाव में कांग्रेस को बुरी तरह हार मिली थी. बिहार विधान सभा 1980 के चुनाव में कांग्रेस एक बार फिर सबसे बड़ी पार्टी के रूप में उभरी, और जगन्नाथ मिश्रा ने बिहार के मुख्यमंत्री के रूप में शपथ ली. कुछ ही दिन बाद कांग्रेस में सियासी उठापठक के बाद बिहार में कांग्रेस ने सीएम को बदल दिया. चंद्रशेखर सिंह बिहार के मुख्यमंत्री बने

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1985 का चुनाव आम नेताओं का चुनाव नहीं रहा
1985 में हुए बिहार विधानसभा चुनाव ने बिहार में सामाजिक और राजनीतक परिवर्तन का नया दौर शुरू कर दिया. चुनाव लड़ना या नेतागिरी करना अब सामान्य व्यक्ति के बूते की बात नहीं रहने वाली थी. चुनाव पूर्व दलसिंहसराय, बेतिया, सीतामढ़ी, सिवान, वारसलीगंज, मोतिहारी तथा विक्रमगंज में हुई हिंसक घटनाएं संकेत देने लगी थीं कि अब ‘बैलट’ पर ‘बुलेट’ भारी पड़ेगा. बिहार के पूर्व मुख्यमंत्री कर्पूरी ठाकुर ने अपने समर्थकों से कहा कि वे कानूनी या गैर-कानूनी, जैसे भी हो, हथियार इकट्‌ठा कर लें. यदि कांग्रेस के गुंडे बूथ लूटने की कोशिश करें तो जान पर खेलकर भी लोकतंत्र की रक्षा करें. मुख्यमंत्री चंद्रशेखर सिंह ने उनके इस बयान की तीव्र निंदा की थी.

कांग्रेस को मिला पूर्ण बहुमत
1985 के विधानसभा चुनाव में कांग्रेस ने 323 उम्मीदवार खड़े किए उनमें से 196 जीते. लोकदल ने 261 उम्मीदवार खड़े किए, उनमें 46 जीते. जनता पार्टी ने 229 उम्मीदवार खड़े किए, उनमें 13 जीते. भाकपा ने 167 उम्मीदवार उतारा, 12 सीटें जीतीं. माकपा ने 44 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, 1 सीट मिली. आईपीएफ 85 सीटों पर लड़ा,उसका एक भी उम्मीदवार नहीं जीत सका. बीजेपी ने 234 सीटों पर उम्मीदवार खड़े किए, 16 सीटें मिलीं. झामुमो 57 सीटों पर लड़ी, 9 जीती.

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बिहार में लालू यूग की शुरूआत
1990 में बिहार विधानसभा के चुनाव हुए और उसमें कांग्रेस आजादी के बाद अब के अपने प्रदर्शन के निचले पायदान पर थी. उसे महज 71 सीटें हासिल हुईं. जनता दल 122 विधायकों के साथ सबसे बड़े दल के रूप में सामने था. केंद्र की तर्ज पर जनता दल की बनने वाली सरकार को भाकपा, माकपा और भाजपा ने समर्थन दिया था. पर कुछ ही महीनों बाद बीजेपी राष्ट्रीय स्तर पर बने मोर्चा से बाहर हो गयी. 1990 से 2005 तक लालू प्रसाद और राबड़ी देवी की सरकार रही और इस दौरान राजनीति का चेहरा, उसके सामाजिक समीकरण पूरी तरह बदल गये. लगभग एक ही सामाजिक समीकरण पर किसी सरकार का डेढ़ दशक तक सत्ता में बने रहना दूसरी परिघटना थी. इसके पहले 1952 से 1967 तक कांग्रेस की सरकार थी जो पंद्रह साल तक चली.

1995 में बिहार के लिए अहम पड़ाव
पार्टी नेता और लालू प्रसाद के निकट रहे नीतीश कुमार ने 1994 में उन्हें लंबी चिट्ठी लिखी. आगाह किया कि किस तरह सामाजिक न्याय की राजनीति बेपटरी होती जा रही है. पर लालू प्रसाद पर उन लेटरों का कोई असर नहीं हुआ और 1995 के चुनाव में उन्हें टक्कर देने के लिए जॉर्ज फर्णाडीस और नीतीश कुमार के नेतृत्व में समता पार्टी भी उतरी. जनता दल को 167 सीटें मिलीं यानि विधानसभा में अकेले बहुमत. वहीं, समता पार्टी को केवल सात सीटों पर कामयाबी मिली.

1996 से पशुपालन घोटाले हुआ. इस मामले की जांच सीबीआइ से कराने की मांग को लेकर पटना हाइकोर्ट में याचिका भी दायर की गयी. तब तक जनता दल ने लालू प्रसाद से मुख्यमंत्री पद छोड़ने का निर्देश दिया, लेकिन उन्होंने जनता दल से अलग होकर पांच जुलाई 1997 के राष्ट्रीय जनता दल नाम से नयी पार्टी बना ली. उधर, अदालत की निगरानी में सीबीआइ जांच तेजी से चल रही थी. लालू प्रसाद को उसने आरोपी बना दिया. ऐसे में लालू को मुख्यमंत्री का पद छोड़ना पड़ा. उनकी जगह राजद विधायकों ने उनकी पत्नी राबड़ी देवी को विधायक दल का नया नेता चुन लिया. इस तरह राबड़ी देवी बिहार की पहली महिला मुख्यमंत्री बनीं.

लालू राज का अंत, सुशासन राज की शुरुआत
साल 2000 और 2005 के चुनाव परिणाम से साफ हो गया कि सामाजिक न्याय की जो शक्तियां लालू के आकर्षण में बंधी थीं, उसमें क्षरण आने लगा था. समता पार्टी का जनता दल (यू) में विलय से साफ हो गया था कि एक ही सामाजिक आधार के लिए लड़ाई और तीखी होगी. जदयू-भाजपा गठजोड़ ने दोनों पार्टियों के आधार को विस्तार दिया. 2005 के विधानसभा चुनाव में राजद की सीटें घटकर 88 पर पहुंच गयी और वह सरकार से बाहर हो गया. जदयू और बीजेपी की अगुआई में नये सामाजिक आधार वाले गठबंधन की सरकार सत्ता में पहुंची. लालू प्रसाद के माय (मुसलिम-यादव) समीकरण की ऐसी ताकत नहीं रह गयी थी कि वह उन्हें सत्ता में पहुंचा सके. सदी के अंतिम साल, यानी 15 नवंबर 2000 को बिहार का विभाजन हुआ और झारखंड अस्तित्व में आया. विधानसभा की सीटें 324 से घटकर 243 हो गयीं.

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नीतीश के हाथों कमान
साल 2005 बिहार की राजनीति के लिए अहम वर्ष रहा. 15 साल के राजद शासन के बाद बिहार की राजनीति ने करवट ली. एक साल में दो बार विधानसभा चुनाव कराए गए. विभाजित बिहार में सुशासन और विकास राजनीति का मुख्य मुद्दा बना. सत्ता की कमान नीतीश कुमार को संभालने का मौका मिला. बिहार में 243 विधानसभा सीट के लिए फरवरी 2005 में हुए चुनाव में किसी दल को सरकार बनाने के लिए पर्याप्त बहुमत नहीं मिली. गठबंधन की सरकार बनाने को बेताब राजद को इस बार सत्ता की चाभी नहीं मिली. ऐसे में फिर चुनाव में जाने के सिवाय कोई विकल्प नहीं था. फिर अक्टूबर 2005 में हुए विधानसभा चुनाव में जदयू और बीजेपी गठबंधन को भारी सफलता मिली. राजद को जहां 75 सीटें मिली थी. वहीं अक्टूबर में यह घटकर 54 हो गयी. जदयू को 55 की जगह 88 और बीजेपी को 37 के स्थान पर 55 सीटें मिली. इसी प्रकार कांग्रेस को 10 के स्थान पर नौ तो लोक जनशक्ति पार्टी को 29 की जगह मात्र 10 सीटें मिली. इस तरह से बिहार में नीतीश कुमार के सुशासन राज की शुरूआत हुई.

2010 विधानसभा चुनाव में फिर सुशासन सरकार
बिहार के नीतीश कुमार एक बार फिर राज्‍य के मुख्‍यमंत्री बने गए हैं. पिछले विधानसभा चुनाव यानी 2005 में जिस प्रकार नीतीश की जीत हुई थी, वो सिर्फ इसलिए क्‍योंकि उससे पहले बिहार का शासन 'काल' के समान था. हर लोगों की उम्‍मीदों पर पूरी तरह खरे उतरे नीतीश ने और ज्‍यादा सीटों पर कब्‍जा किया है. वहीं लालू यादव की पार्टी राजद और कांग्रेस की सीटें आधी से भी कम हो गईं. साल 2005 में नीतीश की जनता दल यूनाइटेड ने जहां 88 सीटें जीती थीं, वहीं इस बार 115 सीटों पर कब्‍जा किया है. बीजेपी ने 55 के आंकड़े से छलांग लगाते हुए 91 सीटों पर विजय हांसिल की.

मोदी लहर के खिलाफ बना महागठबंधन
2014 लोकसभा चुनाव के बाद बिहार में पहली बार चुनाव हो रहा था. देश में मोदी लहर थी. जेडयू और बीजेपी पहली बार बिहार में विधानसभा चुनाव अलग-अलग लड़ रहे थे. बीजेपी से अलग होकर नीतीश कुमार ने बिहार में महागठबंधन बनाया और हैट्रिक लगाई. महागठबंधन ने 178 सीटें अपने नाम की. सरकार बनाई, लेकिन कुछ महीनों बाद नीतीश कुमार दोबार बीजेपी से गठबंधन कर सरकार बनाई और आरजेडी से अलग हो गए.

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First Published : 25 Aug 2020, 03:43:22 PM

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