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कृष्ण जन्मभूमि: औंरगजेब ने दिए थे मंदिर को गिराने के आदेश, सामने आए दस्तावेज

भगवान राम की नगरी अयोध्या में श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है. अब मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की 13.37 एकड़ जमीन का मालिकाना हक पाने और शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मुहिम तेज है.

Written By : अरविंद सिंह | Edited By : Dalchand Kumar | Updated on: 07 Oct 2020, 04:47:43 PM
Krishna Janmabhoomi

कृष्ण जन्मभूमि: औंरगजेब ने दिए थे मंदिर गिराने के आदेश, पढ़ें पूरी खबर (Photo Credit: फाइल फोटो)

मथुरा:

भगवान राम की नगरी अयोध्या में श्रीराम के भव्य मंदिर का निर्माण शुरू हो चुका है. अब मथुरा में कृष्ण जन्मभूमि की 13.37 एकड़ जमीन का मालिकाना हक पाने और शाही ईदगाह मस्जिद को हटाने की मुहिम तेज है. मथुरा में पूरा विवाद श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही मस्जिद ईदगाह के बीच है. यह विवाद अब न्यायालय की चौखट पर दस्तक दे चुका है. कृष्ण नगरी मथुरा का इतिहास बहुत पुराना है और उसी इतिहास का एक हिस्सा यह विवाद है.

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इसी इतिहास के पन्नों में श्रीकृष्ण जन्मभूमि और शाही मस्जिद ईदगाह से जुड़े तथ्य भी छिपे हैं. सभी जानते हैं कि मुगल बादशाह औरंगजेब ने 31 जुलाई 1658 से लेकर 3 मार्च 1707 तक देश में शासन किया. कहा जाता है कि अपनी कट्टर इस्लामी फितरत के चलते उसने बहुत से मंदिर/हिंदू धार्मिक स्थलों को ध्वस्त करने का आदेश दिया. 1670 में कटरा केशव देव मथुरा में भगवान श्रीकृष्ण के जन्मस्थान वाले मंदिर को भी ध्वस्त किया गया और ताकत का प्रदर्शन के लिए ईदगाह मस्जिद के नाम से एक इमारत तामीर कर दी गई. इसको लेकर औरंगजेब के तमाम ऐतिहासिक फरमान आज हमारे पास आए हैं.

हिंदू पक्ष की ओर से याचिकाकर्ता के वकील हरिशंकर जैन से बात की गई है, जिनके पास ये सारे ऐतिहासिक फरमान मौजूद है. इस फरमान के मुताबिक, 1670 में मुगल फौज ने मथुरा के केशवराय मंदिर को (जोकि राजा वीर सिंह देव ने 33 लाख की लागत से बनाया था) गिरा दिया गया, उसकी जगह मस्जिद तामीर कर दी गई. यही नहीं, यहां मंदिर में मौजूद मूर्तियों को आगरा ले जाकर बेगम शाही मस्जिद की सीढ़ियों के नीचे दफन कर दिया गया, ताकि नमाज के लिए जाते वक्त लोग उनसे गुजर कर आगे बढ़ सकें.

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1770 में मराठों ने गोर्वधन में युद्ध में मुगलों को हरा दिया. युद्ध जीतने के साथ ही मराठों का आगरा और मथुरा पर कब्जा हो गया और उन्होंने वहां मस्जिद हटाकर वहां दोबारा मंदिर का निर्माण कराया. 1803 में अंग्रेजों ने पूरे इलाके पर कब्जा कर लिया. उन्होंने 13.37 एकड़ क्षेत्र वाले पूरे कटरा केशव देव को नजूल जमीन घोषित किया. 1815 में जमीन की नीलामी हुई और बनारस के राजा पटनी मल ने पूरी जमीन खरीद ली.

मुस्लिम पक्ष ने राजा पटनीमल और उनके वंशजों के मालिकाना हक़/ कब्जे / खिलाफ कई मुकदमे दायर हुए, लेकिन ये सब खारिज हुए.1888 में कटरा केशव देव की पूर्वी साइड को रेलवे के लिए हटाया गया, उसका मुआवजा भी पटनीमल के वंशज राय नर सिंह दास को ही मिला. 1920 में पहली बार जमीन के मालिकाना हक के लिए मुस्लिम पक्ष ने सिविल सूट दायर किया. ये सिविल सूट नंबर 76 था. सिविल जज ने मौके का मुआयना किया और फैसले में लिखा- यहां लंबे वक्त से हिंदू मंदिर रहा है. पुराने मौजूद मंदिर पर नया मंदिर बनाया गया है. लिहाज़ा मुस्लिम पक्ष का दावा खारिज होता है.

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1921 में इसके खिलाफ मुस्लिम पक्ष ने जिला जज की अदालत में अर्जी लगाई, लेकिन वहां से उन्हें कोई राहत नहीं मिली. कोर्ट ने हिंदू पक्ष के मालिकाना हक पर मुहर लगाई. 1928 में राय किशन दास ने इस शिकायत के साथ कोर्ट का रुख किया कि मुस्लिम पक्ष जबरदस्ती कब्जा करने की कोशिश में है. कोर्ट ने एक बार हिन्दू पक्ष में हक में फैसला दिया. 1935 में इलाहाबाद HC ने फैसले में कहा कि राजा पटनीमल और उनके वंशज ही कटरा केशव देव की 13.37 एकड़ ज़मीन के हक़दार है और मुस्लिम पक्ष का इस ज़मीन के किसी हिस्से पर कोई हक नहीं है.

First Published : 07 Oct 2020, 04:24:48 PM

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