लंदन में फर्टिलिटी मरीजों को हाई कोर्ट ने दी बड़ी राहत, क्लिनिक की गलती से होने वाला था नुकसान, जानें मामला

लंदन में फर्टिलिटी के मरीजों को हाई कोर्ट ने राहत दी है. दरअसल, इन लोगों ने अपने एग्स और स्पर्म को सुरक्षित रखवाया था, जिसे क्लिनिक द्वारा नष्ट करवाया जा रहा था. आइए जानें पूरा मामला.

लंदन में फर्टिलिटी के मरीजों को हाई कोर्ट ने राहत दी है. दरअसल, इन लोगों ने अपने एग्स और स्पर्म को सुरक्षित रखवाया था, जिसे क्लिनिक द्वारा नष्ट करवाया जा रहा था. आइए जानें पूरा मामला.

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Namrata Mohanty
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london ivf case Photograph: (SORA)

लंदन से एक बड़ी और राहत देने वाली खबर सामने आई है. यहां 15 से ज्यादा फर्टिलिटी मरीजों ने हाई कोर्ट में अपना केस जीता है. दरअसल, इन मरीजों में कुछ कैंसर सर्वाइवर्स भी शामिल थे, जिन्होंने इलाज से पहले अपने एग्स, स्पर्म और भ्रूण सुरक्षित रखवाए थे ताकि भविष्य में जब वे ठीक हो जाए तो माता-पिता बन सकें.

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क्या है मामला?

दरअसल, यह मामला फर्टिलिटी क्लिनिकों की लापरवाही से जुड़ा हुआ था. उनके नियमों के मुताबिक मरीजों के अंडे, स्पर्म और भ्रूण को 10 साल तक स्टोर किया जा सकता है. इसके बाद स्टोरेज जारी रखने के लिए कंसेंट  को समय पर रिन्यू कराना जरूरी होता है. लेकिन क्लिनिक की गलती से कई मरीजों का कंसेंट रिन्यू नहीं हो पाया था.

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कैंसर सर्वाइवर्स के लिए अंतिम अवसर

इस गलती की वजह से जून 2025 में उनके भ्रूण, अंडे और स्पर्म नष्ट होने वाले थे. जब मरीजों को इस बात का पता चला तो वे बेहद परेशान हो गए. कई लोगों के लिए माता-पिता बनने का यह उनकी जिंदगी का आखिरी मौका था. खासकर कैंसर सर्वाइवर्स के लिए यह अंतिम अवसर होता है. जब यह मामला हाई कोर्ट तक पहुंचा तो कोर्ट में मरीजों की ओर से कहा गया कि यह उनकी गलती नहीं है बल्कि क्लिनिक की लापरवाही है. ऐसे में उन्हें सजा क्यों मिले?

कोर्ट ने सुनाया यह फैसला?

इसके बाद सुनवाई में जज ने 14 मामलों में मरीजों के पक्ष में फैसला सुनाया. जज ने स्पष्ट कहा कि माता-पिता बनने का मौका घड़ी की टिक-टिक से नहीं छीना जा सकता है. कोर्ट ने कहा कि असली महत्व मरीजों की सहमति और उनकी इच्छा का है, न कि सिर्फ तकनीकी डेडलाइन का. कोर्ट का मानना है कि स्टोरेज जारी रखना वैध है और भ्रूण को नष्ट नहीं किया जा सकता है.

हालांकि, एक मामला कोर्ट ने खारिज कर दिया. उस केस में शुरुआत से ही वैलिड कंसेंट मौजूद नहीं था. इसलिए, अदालत ने उन्हें राहत नहीं दी थी.

कागजी कार्यवाही नहीं छीन सकती पेरेंट्स बनने का सपना

यह फैसला उन सभी फर्टिलिटी मरीजों के लिए बड़ी उम्मीद लेकर आया है, जो तकनीकी कारणों या कागजी प्रक्रिया की वजह से अपने पेरेंट्स बनने के सपने को पूरा नहीं कर पाते. कोर्ट के इस फैसले ने साफ कर दिया कि इंसानी भावनाओं और भविष्य की उम्मीदों को सिर्फ एक तारीख के आधार पर खत्म नहीं किया जा सकता है.

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