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प्रेसिडेंट ट्रंप और राष्ट्रपति शी जिनपिंग (ये एआई इमेज है) Photograph: (grok ai)
पश्चिम एशिया (West Asia) में हालात तब और बिगड़ गए जब 28 फरवरी 2026 को अमेरिका और इजरायल ने मिलकर ईरान पर जोरदार हमले किए. इन हमलों में ईरान के सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई और कई बड़े अधिकारी मारे गए. चीन ने इस घटना की कड़ी निंदा की है और इसे ईरान की आजादी और सुरक्षा पर बड़ा हमला बताया है. लेकिन गौर करने वाली बात यह है कि निंदा भरे बयानों के अलावा चीन ने ईरान की कोई ठोस मदद नहीं की है.
सिर्फ अच्छे वक्त का साथी?
दुनिया भर के जानकारों का कहना है कि चीन एक ऐसा दोस्त है जो बातें तो बड़ी-बड़ी करता है, लेकिन जब खतरा मोल लेने की बात आती है, तो वह पीछे हट जाता है. वाशिंगटन स्थित 'फाउंडेशन फॉर डिफेंस ऑफ डेमोक्रेसी' के विशेषज्ञों का मानना है कि चीन संयुक्त राष्ट्र (UN) में तो ईरान के पक्ष में बोलेगा, लेकिन उसे हथियार या सेना जैसी कोई बड़ी मदद नहीं देगा. इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि चीन के लिए ईरान से ज्यादा जरूरी अमेरिका के साथ उसके व्यापारिक रिश्ते हैं.
ट्रंप का डर और व्यापार का गणित
डोनाल्ड ट्रंप के दोबारा सत्ता में आने के बाद से उन्होंने चीन के दो सबसे करीबी दोस्तों वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो और ईरान के खामेनेई को सीधे निशाने पर लिया है. चीन इस समय अमेरिका के साथ किसी भी तरह के नए तनाव से बचना चाहता है. वह पिछले एक साल में ट्रंप प्रशासन के साथ बने सकारात्मक माहौल और व्यापारिक समझौतों को दांव पर नहीं लगाना चाहता. इसीलिए, वह ईरान के मुद्दे पर सिर्फ उतनी ही बात कर रहा है जिससे उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि बनी रहे, लेकिन अमेरिका से उसके रिश्ते न बिगड़ें.
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क्या ये है तेल का खेल?
यह सच है कि चीन ईरान के तेल का सबसे बड़ा खरीदार है, लेकिन अगर हम आंकड़ों को देखें तो खाड़ी के दूसरे देशों (जैसे सऊदी अरब और यूएई) के साथ चीन का व्यापार और निवेश कहीं ज्यादा है. जानकारों का कहना है कि ईरान के साथ चीन का सैन्य सहयोग भी बहुत सीमित रहा है. चीन ने ईरान को BRICS और शंघाई सहयोग संगठन (SCO) जैसे समूहों में शामिल होने में मदद तो की, लेकिन जब बात सुरक्षा की आती है, तो चीन खुद को 'बॉडीगार्ड' के तौर पर पेश करने से बचता है.
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अफगानिस्तान और इराक से सीखा सबक
चीन ने अमेरिका की उन गलतियों से सबक लिया है जो उसने अफगानिस्तान और इराक में की थीं. चीन नहीं चाहता कि वह किसी दूसरे देश की जंग में फंसकर अपने पैसे और संसाधन बर्बाद करे. वह खुद को एक शांति दूत के रूप में दिखाना चाहता है, जैसा कि उसने 2023 में ईरान और सऊदी अरब के बीच समझौता कराकर किया था. सिंगापुर के विशेषज्ञों का मानना है कि ईरान चीन का पुराना साथी तो है, लेकिन वह इतना भी जरूरी नहीं है कि उसके लिए चीन अपनी अर्थव्यवस्था को खतरे में डाल दे.
दूसरे देशों के लिए चेतावनी
चीन के इस रवैये ने उन देशों की चिंता बढ़ा दी है जो सुरक्षा के लिए चीन की तरफ देखते हैं. वेनेजुएला से लेकर ईरान तक के हालात देखकर अब दूसरे देश यह सवाल पूछ रहे हैं कि क्या जरूरत पड़ने पर बीजिंग उनका साथ छोड़ देगा? फिलहाल के हालात तो यही बता रहे हैं कि चीन के लिए 'अपना फायदा' सबसे ऊपर है.
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