Middle East Tension: मिडिल ईस्ट में जारी तनाव का असर अब भारत में भी दिखने लगा है. युद्ध की वजह से क्रूड ऑयल के भाव बढ़ सकते हैं. जानें इसके बारे में…
Middle East Tension: मिडिल ईस्ट में इन दिनों तनाव काफी बढ़ गया है. ईरान, इजराइल और यूनाइटेड स्टेट्स के बीच चल रहे संघर्ष को अब करीब 6 दिन हो चुके हैं और इसका असर पूरे मिडिल ईस्ट क्षेत्र में दिखाई दे रहा है. इस जंग की वजह से वहां हालात काफी नाजुक हो गए हैं. कई जगहों पर हवाई सफर लगभग रुक गया है. कई देशों ने अपने एयर स्पेस को बंद कर दिया है. इसके अलावा तेल की सप्लाई पर भी बड़ा असर पड़ा है, जिससे दुनिया की चिंता बढ़ गई है. इस युद्ध में और देशों के शामिल होने की आशंका भी जताई जा रही है क्योंकि ईरान ने मिडिल ईस्ट के कई इलाकों में मिसाइलें दागी हैं. इससे पूरे क्षेत्र में तनाव और बढ़ गया है.
इस बीच चीन भी ईरान के समर्थन में बयान दे रहा है, जिससे हालात और ज्यादा गंभीर होते दिखाई दे रहे हैं. हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति डॉनल्ड ट्रंप ने संकेत दिया है कि आने वाले चार हफ्तों में यह युद्ध खत्म हो सकता है. लेकिन फिलहाल दुनिया की सबसे बड़ी चिंता कच्चे तेल की सप्लाई को लेकर है. दरअसल, इस तनाव का सबसे बड़ा असर स्ट्रेट ऑफ हॉर्मूस पर पड़ा है. यह एक संकरा समुद्री रास्ता है, जो फारस की खाड़ी को खुले समुद्र से जोड़ता है. इस रास्ते से दुनिया की लगभग 20% ऊर्जा सप्लाई गुजरती है. खासकर एशिया के कई देश, जैसे भारत और चीन इस रास्ते से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल आयात करते हैं.
भारत के पास इतना तेल भंडार
भारत की बात करें तो वह अपनी जरूरत का करीब आधा कच्चा तेल इसी रास्ते से आने वाले खाड़ी देशों से मंगवाता है. जब से इस इलाके में तनाव बढ़ा है और यह रास्ता बंद होने की खबरें सामने आई हैं, तब से कच्चे तेल की कीमतों में तेज उछाल देखने को मिल रहा है. दरअसल कच्चे तेल की कीमत करीब $95 प्रति बैरल तक पहुंच गई है और कुछ ही दिनों में इसमें करीब 2.5% की बढ़ोतरी दर्ज की गई है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अगर यह युद्ध लंबे समय तक चलता है तो ब्रांडेड क्रूड ऑयल की कीमत और ऊपर जा सकती है. मिडिल ईस्ट के इस रास्ते से सऊदी अरब, इराक, कुवैत और यूनाइटेड अरब अमीरेट्स जैसे देशों का कच्चा तेल एशिया और यूरोप के बाजारों में पहुंचता है. इसीलिए अगर यह रास्ता लंबे समय तक बंद रहता है तो इसका असर दुनिया की बड़ी अर्थव्यवस्थाओं पर सीधा पड़ सकता है. भारत पर इसका असर सबसे ज्यादा पड़ने की आशंका है क्योंकि भारत अपनी जरूरत का लगभग 95% कच्चा तेल आयात करता है.
सरकारी सूत्रों के अनुसार भारत के पास करीब 50 दिनों का ईंधन भंडार मौजूद है. इसमें लगभग 25 दिनों का कच्चा तेल और 25 दिनों के पेट्रोलियम उत्पादन शामिल हैं. अगर सप्लाई लंबे समय तक बाधित रहती है तो पेट्रोल और डीजल की कीमतें बढ़ सकती हैं. इससे ट्रांसपोर्ट और लॉजिस्टिक्स महंगे हो सकते हैं. महंगाई बढ़ सकती है और भारतीय रुपये की ताकत भी घट सकती है. भारतीय मुद्रा पर बढ़ते दबाव का असर देश की अर्थव्यवस्था और जीडीपी पर भी पड़ सकता है.
चीन के पास इतना तेल भंडार
चीन पर भी इसका असर साफ देखने को मिल सकता है क्योंकि चीन दुनिया का सबसे बड़ा कच्चा तेल आयात करने वाला देश है. उसकी मैन्युफैक्चरिंग इंडस्ट्री काफी हद तक कच्चे तेल पर निर्भर करती है. चीन अपनी जरूरत का 80% से ज्यादा तेल आयात करता है. हालांकि चीन के पास करीब 6 महीने का तेल भंडार मौजूद है जिससे उसे कुछ राहत मिल सकती है. इसके अलावा चीन रूस से भी तेल आयात करता रहा है. फिर भी अगर तेल की कीमतें लगातार बढ़ती है तो चीन की उत्पादन लागत बढ़ सकती है और उसकी इंडस्ट्री और निर्यात पर असर पड़ सकता है.
अमेरिका के पास इतना तेल भंडार
अगर यूनाइटेड स्टेट्स की बात करें तो उसके पास लगभग 4 महीने का आधिकारिक तेल भंडार है. इसके अलावा वेनेजुला जैसे देशों से आने वाले तेल को मिलाकर अमेरिका के पास काफी बड़ा भंडार माना जाता है. फिर भी अगर वैश्विक बाजार में कच्चे तेल की कीमतें लगातार बढ़ती हैं तो अमेरिका पर भी महंगाई बढ़ सकती है. साथ ही अमेरिका इस संघर्ष में सीधे तौर पर शामिल है, जिससे उसके खर्च और आर्थिक दबाव पर भी बढ़ोतरी हो सकती है. कुल मिलाकर मिडिल ईस्ट में चल रहा यह तनाव सिर्फ उस क्षेत्र तक सीमित नहीं बल्कि इसका असर पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है. अगर यह युद्ध जल्द खत्म नहीं हुआ तो आने वाले समय में वैश्विक बाजार और आर्थिक स्थिति पर इसका बड़ा असर देखने को मिल सकता है.
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