जंग के छठे दिन ईरान का बड़ा यू-टर्न? परमाणु प्रोग्राम बंद करने के संकेत

ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच छिड़ी जंग अब छठे दिन में प्रवेश कर चुकी है. इस बीच ईरानी उप-विदेश मंत्री के 'परमाणु प्रोग्राम छोड़ने' वाले बयान ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है. जानें क्या है इस बयान का पूरा सच और क्यों 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के बाद ईरान की भाषा बदलती दिख रही है.

ईरान और इजरायल-अमेरिका के बीच छिड़ी जंग अब छठे दिन में प्रवेश कर चुकी है. इस बीच ईरानी उप-विदेश मंत्री के 'परमाणु प्रोग्राम छोड़ने' वाले बयान ने पूरी दुनिया में हलचल मचा दी है. जानें क्या है इस बयान का पूरा सच और क्यों 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' के बाद ईरान की भाषा बदलती दिख रही है.

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Ravi Prashant
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प्रेसि़डेंट डोनाल्ड ट्रंप Photograph: (Grok AI)

पश्चिम एशिया में मचे घमासान के बीच एक खबर ने सबको चौंका दिया. मीडिया रिपोर्ट्स में दावा किया गया कि ईरान के उप-विदेश मंत्री माजिद तख्त-रवांची ने कहा है कि अगर अमेरिका कोई 'बेहतर विकल्प' दे, तो ईरान अपना परमाणु प्रोग्राम छोड़ने को तैयार है. लेकिन जैसे ही यह खबर फैली, ईरान की सरकारी न्यूज एजेंसी IRNA ने इस पर सफाई दी. उन्होंने कहा कि यह बयान मौजूदा जंग को लेकर नहीं, बल्कि अमेरिका के साथ हुई 'पुरानी बातचीत' के संदर्भ में था.

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'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और खामेनेई की मौत

यह सारा घटनाक्रम तब हो रहा है जब इजरायल और अमेरिका की संयुक्त जंग को छह दिन हो गए हैं. 28 फरवरी 2026 को शुरू हुए 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' ने ईरान की कमर तोड़ दी है. इसी हमले में ईरान के सबसे बड़े नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की भी मौत हो गई थी. तेहरान का कहना है कि वे अमेरिका के साथ बातचीत की मेज पर बैठे तो थे, लेकिन तय समय से पहले ही उन पर हमला कर दिया गया.

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जेनेवा की वो आखिरी कोशिश

28 फरवरी के हमले से ठीक 10 दिन पहले, यानी 17 फरवरी को जेनेवा में बातचीत का एक आखिरी दौर चला था. ओमान की मध्यस्थता में हुई इस मीटिंग का मकसद जंग को टालना था. उस समय राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने एयरफोर्स वन से ही चेतावनी दी थी कि "अगर ईरान डील नहीं करता, तो अंजाम बुरा होगा." ईरान को उम्मीद थी कि अमेरिका पाबंदियों को हटाने पर विचार करेगा, लेकिन बातचीत का वह रास्ता पूरी तरह बंद हो गया.

अमेरिका का असली मकसद क्या है?

वाशिंगटन ने साफ कर दिया है कि उनका मकसद अब सिर्फ समझौता करना नहीं है, बल्कि पूरे इलाके की तस्वीर बदलना है. ट्रंप प्रशासन का कहना है कि वे ईरान को परमाणु हथियारों तक कभी पहुंचने नहीं देंगे क्योंकि यह पूरी दुनिया के लिए खतरा है. अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, मौजूदा सैन्य कार्रवाई कोई पहली पसंद नहीं थी, बल्कि यह ईरान के साथ डिप्लोमेसी फेल होने का नतीजा है.

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पाबंदियों की मार और समझौते की उम्मीद

ईरान के उप-विदेश मंत्री ने पहले ही कहा था कि अगर अमेरिका उनकी अर्थव्यवस्था पर लगी पाबंदियों को हटा दे, तो वे अपने यूरेनियम भंडार पर समझौता कर सकते हैं. ईरान के लोगों के लिए इस समय पैसों की किल्लत और महंगाई सबसे बड़ी समस्या है. लेकिन अब जब जंग शुरू हो चुकी है, तो 'पाबंदियों में ढील' की बात कोसों दूर नजर आती है.

क्या अब शांति की गुंजाइश है?

फिलहाल तेहरान और वाशिंगटन, दोनों ही पीछे हटने को तैयार नहीं दिख रहे. एक तरफ अमेरिका ईरान में सत्ता परिवर्तन और सुरक्षा की गारंटी चाहता है, तो दूसरी तरफ ईरान अपने हक की बात कर रहा है. लेकिन खामेनेई की मौत के बाद ईरान के अंदरूनी हालात और भी नाजुक हो गए हैं, जिससे आने वाले दिनों में कुछ बड़े और चौंकाने वाले फैसले देखने को मिल सकते हैं.

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