ट्रंप का साथ और 'अनलिमिटेड' हथियार, फिर भी इजरायली सेना के सामने क्यों खड़ी है बड़ी चुनौती?

ईरान के खिलाफ नए युद्ध ने इजरायल की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल दिया है. कुछ ही दिनों में 15 से 25 अरब शेकेल खर्च हो चुके हैं. गजा, लेबनान और ईरान तीनों मोर्चों पर जारी संघर्ष के बीच सरकार ने टैक्स बढ़ाया है और लंबे युद्ध से आर्थिक संकट की आशंका बढ़ गई है.

ईरान के खिलाफ नए युद्ध ने इजरायल की अर्थव्यवस्था पर भारी बोझ डाल दिया है. कुछ ही दिनों में 15 से 25 अरब शेकेल खर्च हो चुके हैं. गजा, लेबनान और ईरान तीनों मोर्चों पर जारी संघर्ष के बीच सरकार ने टैक्स बढ़ाया है और लंबे युद्ध से आर्थिक संकट की आशंका बढ़ गई है.

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Ravi Prashant
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इजराइल-ईरान युद्ध Photograph: (GROK AI)

इजरायल की सरकार अब इस जंग को 'वॉर ऑफ रिडेम्पशन' यानी मुक्ति का युद्ध कह रही है. इजरायल की अर्थव्यवस्था ने काफी मजबूती दिखाई है और 2025 में उसकी विकास दर 3.1% रही, जिसका बड़ा कारण डिफेंस पर होने वाला खर्च था. लेकिन मार्च 2026 में ईरान के खिलाफ शुरू हुए इस नए मोर्चे ने देश पर भारी आर्थिक बोझ डाल दिया है.

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केवल पिछले कुछ दिनों में इस जंग पर 15 से 25 अरब शेकेल (इजरायली मुद्रा) का अतिरिक्त खर्च हो गए हैं. देश का कर्ज भी 2024 के अंत तक जीडीपी के 69% तक पहुंच गया था, जो अब और बढ़ रहा है. सरकार ने इस खर्च की भरपाई के लिए वैट (VAT) को बढ़ाकर 18% कर दिया है. अर्थशास्त्रियों ने चेतावनी दी है कि इजरायल एक छोटी और तेज जंग तो सह सकता है, लेकिन अगर यह सालों तक चली, तो देश की साख को बड़ा खतरा हो सकता है.

खत्म नहीं हुई है पुरानी जंग

भले ही पूरी दुनिया का ध्यान अब ईरान पर है, लेकिन गजा का संकट अभी पूरी तरह टला नहीं है. अक्टूबर 2023 से शुरू हुई यह लड़ाई अब अपने तीसरे साल में प्रवेश कर चुकी है. गजा अब इजरायल के लिए प्राथमिक मोर्चा नहीं रहा, क्योंकि उसकी ज्यादातर खास टुकड़ियों को लेबनान और ईरान की मिसाइलों को रोकने के लिए तैनात कर दिया गया है.

गजा में इजरायल ने अब एक 'येलो लाइन' बना दी है, जिसके पीछे उसकी सेना हमेशा तैनात रहती है. अक्टूबर 2025 में हुए एक समझौते के बाद वहां शांति की कोशिश तो हुई, लेकिन यह बहुत कमजोर साबित हुई है. उस समझौते के बाद भी करीब 500 फिलिस्तीनी मारे जा चुके हैं. ईरान से युद्ध शुरू होते ही इजरायल ने एक बार फिर गजा में सामान की सप्लाई रोक दी है. गजा अब इजरायल के लिए एक 'जमा हुआ युद्ध' बन गया है, जिसे वह थोड़े से सैनिकों के साथ मैनेज कर रहा है.

हिजबुल्लाह को पीछे धकेलने की कोशिश

3 मार्च 2026 से इजरायल ने लेबनान की सीमा पर केवल झड़पों तक सीमित रहने के बजाय जमीनी स्तर पर घुसना शुरू कर दिया है. इजरायली सेना ने उन इलाकों पर कब्जा करना शुरू किया है, जहां से हिजबुल्लाह उनके गांवों पर मिसाइलें दागता था. इजरायली वायुसेना लगभग हर दिन हिजबुल्लाह के ठिकानों पर बमबारी कर रही है. इजरायल ने लेबनान की सरकार को सख्त चेतावनी दी है कि अगर उनकी सेना ने हिजबुल्लाह को काबू नहीं किया, तो इजरायल लेबनान के बिजली घरों और पुलों जैसे अहम ठिकानों को भी निशाना बनाना शुरू कर देगा.

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आम इजरायलियों का हाल

विदेशी मीडिया की रिपोर्टों के अनुसार, इजरायल की जनता इस समय मिली-जुली भावनाओं के बीच जी रही है. एक तरफ थकान है, तो दूसरी तरफ यह उम्मीद कि शायद इस बार 'सांप के सिर' (ईरान) पर हमला करके सब कुछ हमेशा के लिए ठीक हो जाएगा. तेल अवीव और अश्कलोन जैसे शहरों में ईरानी मिसाइलें गिरने के बाद से लोग बंकरों में रहने को मजबूर हैं.

देश का मुख्य एयरपोर्ट बंद है और लोग पूरी तरह से अलर्ट ऐप्स पर निर्भर हैं. उत्तरी इजरायल से भागे हुए लोग वापस तब तक नहीं लौटना चाहते, जब तक लेबनान में हिजबुल्लाह का खतरा पूरी तरह खत्म न हो जाए. वहीं कुछ लोग यह भी कह रहे हैं कि प्रधानमंत्री नेतन्याहू अपनी राजनीति बचाने के लिए इस जंग को खींच रहे हैं.

तेल की कीमतें और वैश्विक दबा

यह जंग केवल इजरायल और ईरान तक सीमित नहीं रह गई है. ईरान अब खाड़ी देशों पर भी हमले कर रहा है और समुद्री रास्तों को ब्लॉक कर रहा है, जिससे दुनिया भर में पेट्रोल-डीजल के दाम तेजी से बढ़ रहे हैं. अगर एक महीने के भीतर यह युद्ध खत्म नहीं हुआ, तो पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था हिल सकती है, जिससे इजरायल पर युद्ध रोकने का भारी अंतरराष्ट्रीय दबाव बनेगा.

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