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प्रेसिडेंट व्लादिमीर पुतिन और पीएम मोदी Photograph: (ANI)
पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छिड़ी भीषण जंग ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. इस तनाव की वजह से ग्लोबल मार्केट में कच्चे तेल (Crude Oil) की सप्लाई रुकने और कीमतें बढ़ने का खतरा पैदा हो गया है. ऐसे मुश्किल वक्त में भारत के पुराने और भरोसेमंद दोस्त रूस ने मदद का हाथ आगे बढ़ाया है. रूसी सूत्रों के मुताबिक, रूस ने भारत को भरोसा दिलाया है कि वह किसी भी संकट की स्थिति में भारत की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए तैयार है.
संकट के समय रूस की बड़ी पेशकश
जैसे-जैसे मिडिल ईस्ट में युद्ध गहराता जा रहा है, कच्चे तेल की कीमतों में उछाल देखने को मिल रहा है. दुनिया का एक बड़ा हिस्सा तेल के लिए इसी इलाके के समुद्री रास्तों पर निर्भर है. अगर यह जंग लंबी खिंची, तो सप्लाई चेन पूरी तरह टूट सकती है. इसी को भांपते हुए रूस ने भारत को आश्वासन दिया है कि वह न केवल मौजूदा सप्लाई जारी रखेगा, बल्कि ज़रूरत पड़ने पर इसे और बढ़ा भी सकता है. रूस का यह कदम भारत के लिए एक बड़ी राहत की तरह है.
भारत का सबसे बड़ा तेल सप्लायर बना रूस
पिछले कुछ सालों में रूस भारत के लिए कच्चे तेल का सबसे बड़ा स्रोत बनकर उभरा है. जब पश्चिमी देशों ने रूस पर पाबंदियां लगाईं, तब रूसी तेल का रुख एशियाई बाजारों, खासकर भारत की तरफ हो गया. भारतीय रिफाइनरियों ने रूस से मिलने वाले सस्ते और लचीले लॉजिस्टिक्स वाले तेल का फायदा उठाया और खरीदारी बढ़ा दी. इससे भारत को न केवल अपने तेल के स्रोतों में विविधता लाने में मदद मिली, बल्कि वैश्विक स्तर पर कीमतें बढ़ने के बावजूद अपनी लागत को नियंत्रित रखने में भी सफलता मिली.
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बिना रुकावट तेल भेजने का वादा
रॉयटर्स की एक रिपोर्ट के अनुसार, रूसी सूत्रों ने साफ किया है कि मॉस्को भारत को बिना किसी रुकावट के तेल की सप्लाई सुनिश्चित करने के लिए पूरी तरह तैयार है. रूस खुद को एक 'स्थिर और भरोसेमंद पार्टनर' के रूप में पेश कर रहा है. यह आश्वासन ऐसे समय में आया है जब पारंपरिक सप्लाई चेन (जैसे मिडिल ईस्ट के रास्ते) पर भारी दबाव है. रूस चाहता है कि भारत के साथ उसके ऊर्जा संबंध और मज़बूत हों और वह एक संकटमोचक की भूमिका निभा सके.
भारत के लिए क्यों जरूरी है यह 'बफर'?
भारत अपनी जरूरत का लगभग 85% कच्चा तेल विदेशों से मंगाता है, इसलिए 'सप्लाई सुरक्षा' देश के लिए सबसे बड़ी प्राथमिकता है. भारत ने पिछले कुछ समय में केवल मिडिल ईस्ट पर निर्भर रहने के बजाय रूस, अमेरिका, अफ्रीका और लैटिन अमेरिका से भी तेल खरीदना शुरू किया है. अगर मिडिल ईस्ट में तनाव की वजह से समुद्री रास्ते (जैसे होर्मुज की खाड़ी) पूरी तरह से बंद हो जाता है, तो रूस की तरफ से मिलने वाली यह प्रतिबद्धता भारत के लिए एक सुरक्षा कवच (Buffer) का काम करेगी.
चुनौतियां अभी भी हैं बरकरार
हालांकि रूस की यह पेशकश राहत देने वाली है, लेकिन जानकारों का कहना है कि रास्ता इतना भी आसान नहीं है. जहाजों का बीमा (Shipping Insurance), पेमेंट के तरीके और अंतरराष्ट्रीय पाबंदियां अभी भी एक जटिल मुद्दा बनी हुई हैं. भारत ने अब तक इन चुनौतियों का बखूबी सामना किया है. भारत ने पेमेंट के लिए वैकल्पिक रास्ते अपनाए हैं और अपनी रिफाइनरियों की क्षमता का इस्तेमाल अलग-अलग ग्रेड के कच्चे तेल को प्रोसेस करने के लिए किया है.
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