मिडिल ईस्ट में तनाव का भारत पर दिखने लगा असर, 4 दिन में ही लगा इतना बड़ा झटका

ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव के बीच पश्चिम एशिया में मिलिट्री तनाव बढ़ रहा है. जैसे-जैसे मिसाइल और ड्रोन हेडलाइन में हैं, इसका असर हज़ारों किलोमीटर दूर भारत पर दिखना शुरू हो गया है.

ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव के बीच पश्चिम एशिया में मिलिट्री तनाव बढ़ रहा है. जैसे-जैसे मिसाइल और ड्रोन हेडलाइन में हैं, इसका असर हज़ारों किलोमीटर दूर भारत पर दिखना शुरू हो गया है.

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Dheeraj Sharma
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War Impact on India

ईरान, इज़राइल और अमेरिका के बीच बढ़ते टकराव के बीच पश्चिम एशिया में मिलिट्री तनाव बढ़ रहा है. जैसे-जैसे मिसाइल और ड्रोन हेडलाइन में हैं, इसका असर हज़ारों किलोमीटर दूर भारत पर दिखना शुरू हो गया है. जी हां मिडिल ईस्ट की जंग ने भारत के लिए खतरे की घंटी बजा दी है. भारत के खेती वाले इलाके में भी चिंता महसूस की जा रही है. मिडिल ईस्ट में चल रही अस्थिरता ने भारत के बासमती चावल एक्सपोर्ट के लिए गंभीर चिंताएं पैदा कर दी हैं, एक्सपोर्टर और किसान दोनों ही संभावित नुकसान के लिए तैयार हैं. मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक भारत का इस जंग के 4 दिन में 4 लाख टन बासमती चावल फंस चुका है. इसका पेमेंट भी नहीं मिल रहा है. 

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72 फीसदी एक्सपोर्ट मिडिल ईस्ट से जुड़ा है

भारत अपने कुल बासमती चावल एक्सपोर्ट का लगभग 72 फीसदी मिडिल ईस्ट के देशों को भेजता है, जिससे यह इलाका उसका सबसे बड़ा इंटरनेशनल मार्केट बन गया है. 2024-25 में, भारत ने 60,65,483 मीट्रिक टन बासमती चावल एक्सपोर्ट किया, जिससे 50,312 करोड़ की फॉरेन एक्सचेंज कमाई.

इसमें से, 36,139 करोड़ अकेले मिडिल ईस्ट के देशों से आए जो भारत के एग्रीकल्चरल ट्रेड के लिए इस इलाके की बहुत अहमियत को दिखाता है.  हालांकि, चल रहे झगड़े और समुद्री रुकावटों की वजह से, लगभग 4,00,000 मीट्रिक टन बासमती चावल अभी फंसा हुआ है  आधा ट्रांज़िट में और आधा पोर्ट पर फंसा हुआ है. एक्सपोर्टर्स का कहना है कि शिपमेंट लगभग रुक गए हैं, और नए ट्रेड डील भी काफी धीमे हो गए हैं.

समुद्री रुकावटें और इंश्योरेंस संकट

सबसे बड़ी रुकावट खास समुद्री रास्तों में रुकावट है, खासकर होर्मुज स्ट्रेट के आसपास, जो एक ज़रूरी ग्लोबल शिपिंग कॉरिडोर है. बढ़ते तनाव ने शिपिंग कंपनियों को सावधान कर दिया है, जिससे जहाजों और कंटेनरों की भारी कमी हो गई है. 

फ्रेट चार्ज दोगुने से ज़्यादा हो गए हैं, जबकि इंश्योरेंस कंपनियां या तो प्रीमियम में तेज़ी से बढ़ोतरी कर रही हैं या युद्ध से प्रभावित इलाकों के लिए कवरेज देने से मना कर रही हैं. एक्सपोर्टर्स ने चेतावनी दी है कि पैसे का दबाव बढ़ रहा है. क्योंकि बासमती का ज़्यादातर व्यापार क्रेडिट पर चलता है, इसलिए सैकड़ों करोड़ रुपये के पेमेंट अटके होने की खबर है. इंडस्ट्री के प्रतिनिधि सरकार से एक्सपोर्ट क्रेडिट गारंटी कॉर्पोरेशन (ECGC) के ज़रिए दखल देने की अपील कर रहे हैं ताकि बकाया पेमेंट को सुरक्षित किया जा सके और रिस्क कम किया जा सके.

पांच मुख्य खरीदार दबाव में

भारत के बासमती चावल के पांच सबसे बड़े खरीदार मिडिल ईस्ट से हैं सऊदी अरब, इराक, ईरान, संयुक्त अरब अमीरात और यमन. इन देशों की कुल हिस्सेदारी भारत के कुल बासमती एक्सपोर्ट का 67 फीसदी है.

DGCIS के डेटा के मुताबिक, सऊदी अरब सबसे बड़ा इंपोर्टर बना हुआ है, जिसने 2024-25 में 10,191 करोड़ का बासमती खरीदा. ईरान, जो कभी भारत का सबसे बड़ा खरीदार था, ने इसी समय के दौरान 6,374 करोड़ का बासमती इंपोर्ट किया और अभी खरीदारों में तीसरे नंबर पर है.

ईरान की घटती खरीदने की ताकत

ईरान का इंपोर्ट ट्रेंड गहरी आर्थिक तंगी को दिखाता है. 2018-19 में, ईरान ने भारत से 14,83,697 मीट्रिक टन बासमती चावल इंपोर्ट किया था. यह 2019-20 में घटकर 13,19,156 टन, 2022-23 में 9,98,877 टन और 2024-25 में घटकर 8,55,133 टन रह गया.

लगातार गिरावट ईरान में कंज्यूमर की खरीदने की ताकत कम होने का इशारा करती है, जहां आर्थिक पाबंदियों, घरेलू अशांति और अब मिलिट्री तनाव के बीच प्रीमियम चावल की खपत कम हो गई है. एक्सपोर्टर्स को डर है कि अगर यह लड़ाई लंबी चली, तो दिसंबर 2025 मार्च 2026 तिमाही में शिपमेंट में भारी कमी आ सकती है.

भारतीय किसानों पर असर

एक्सपोर्ट में कोई भी लंबी मंदी सीधे भारतीय किसानों पर असर डालेगी, खासकर पंजाब, हरियाणा और पश्चिमी उत्तर प्रदेश में जो बासमती उगाने वाले मुख्य इलाके हैं. एक्सपोर्ट डिमांड में कमी से आमतौर पर घरेलू कीमतें गिरती हैं, जिससे किसानों की इनकम कम होती है. इंडस्ट्री एक्सपर्ट्स चेतावनी देते हैं कि थोड़ी सी भी रुकावट से मार्केट का माहौल खराब हो सकता है. एक्सपोर्टर्स को कम कमाई होने से खरीद की कीमतें कम हो सकती हैं, जिससे मिलर्स से लेकर किसानों तक पूरी सप्लाई चेन पर असर पड़ सकता है.

भारत की ग्लोबल बढ़त खतरे में

पाकिस्तान से कड़े मुकाबले के बावजूद जो बासमती उगाने वाला अकेला दूसरा बड़ा देश है भारत ग्लोबल मार्केट में अपना दबदबा बनाए हुए है. बासमती अब भारत के कुल एग्रीकल्चरल एक्सपोर्ट में लगभग 20 फीसदी का हिस्सा है, जो दुनिया भर में इसके प्रीमियम स्टेटस को दिखाता है.

हालांकि, वेस्ट एशिया में जियोपॉलिटिकल अस्थिरता एक गंभीर चुनौती पेश करती है. हालांकि भारत की ग्लोबल रेप्युटेशन और प्रोडक्ट की क्वालिटी मजबूत बनी हुई है, लेकिन बासमती ट्रेड की मिडिल ईस्ट पर बहुत ज़्यादा निर्भरता इसे बड़े खतरे में डालती है. अगर दुश्मनी बनी रहती है, तो आर्थिक झटके एक्सपोर्टर्स से कहीं आगे तक फैल सकते हैं, और भारत की ग्रामीण इकॉनमी के मूल पर असर डाल सकते हैं. 

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