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अमेरिकी प्रेसिडेंट डोनाल्ड ट्रंप Photograph: (GROK AI)
अमेरिका और ईरान के बीच सालों से चला आ रहा तनाव अब एक खतरनाक मोड़ पर आ गया है. पिछले शनिवार को अमेरिका और इजराइल ने मिलकर ईरान पर सीधे हवाई हमले शुरू कर दिए, जिससे दोनों देशों के बीच खुली जंग छिड़ गई है. इस भीषण अटैक में ईरान के सुप्रीम लीडर अयुतल्लाह अली खामेनेई मारे गए. अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने संकेत दिए हैं कि यह सैन्य कार्रवाई अगले 4 से 5 हफ्तों तक चल सकती है. ट्रंप ने सोशल मीडिया पर एक वीडियो जारी कर बताया कि इस मिशन का नाम 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' रखा गया है.
हमले का असली मकसद क्या है?
राष्ट्रपति ट्रंप ने साफ कहा है कि इस ऑपरेशन का सबसे बड़ा मकसद ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना है. उन्होंने कड़े शब्दों में चेतावनी दी कि अमेरिका ईरान के मिसाइल उद्योग को पूरी तरह तहस-नहस कर देगा. शनिवार से शुरू हुई इस कार्रवाई में अब तक ईरान के अंदर 1,250 से ज़्यादा ठिकानों को निशाना बनाया जा चुका है. इसके अलावा, अमेरिकी सेना ने ईरान के 11 जहाजों को भी तबाह करने का दावा किया है.
ईरान को लगा अब तक का सबसे बड़ा झटका
इस जंग के शुरुआती दौर में ही ईरान को एक ऐसा जख्म मिला है जिसकी भरपाई मुश्किल है. सोमवार को आई खबरों के मुताबिक, 1989 से ईरान की कमान संभाल रहे सर्वोच्च नेता अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत हो गई है. तेहरान में उनके ठिकाने पर हुए अमेरिकी-इजराइली हमले में वह मारे गए. ताजा आंकड़ों के अनुसार, ईरान के 130 अलग-अलग इलाकों में हुए इन हमलों में अब तक 555 लोगों की जान जा चुकी है.
अब तक कितना पैसा बहा चुका है अमेरिका?
अगर हम खर्च की बात करें, तो अमेरिका अक्टूबर 2023 से ही इजराइल और मिडिल ईस्ट में काफी पैसा लगा रहा है. एक रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका ने इजराइल को करीब 21.7 अरब डॉलर की फौजी मदद दी है. इसके अलावा, यमन और ईरान जैसे इलाकों में अपनी सेना के ऑपरेशन्स पर अमेरिका ने करीब 12 अरब डॉलर अलग से खर्च किए हैं. यानी अब तक कुल खर्च 34 अरब डॉलर के करीब पहुंच चुका है, और यह लगातार बढ़ता जा रहा है.
कौन-कौन से हथियारों का हो रहा है इस्तेमाल?
इस जंग में अमेरिका और इजराइल अपने सबसे आधुनिक हथियारों का इस्तेमाल कर रहे हैं. हवा से हमले के लिए B-2 स्टील्थ बॉम्बर, F-35 और F-22 जैसे सबसे तेज लड़ाकू विमान तैनात हैं. समुद्र से टॉमहॉक मिसाइलें दागी जा रही हैं. दिलचस्प बात यह है कि इस बार 'लुकास' (LUCAS) नाम के उन ड्रोन्स का पहली बार इस्तेमाल हुआ है, जिन्हें ईरान के ही पुराने ड्रोन्स की नकल करके बनाया गया है. हालांकि, इस जंग में अमेरिका को नुकसान भी हुआ है. कुवैत के पास एक हादसे में उनके तीन F-15 लड़ाकू विमान गिर गए.
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क्या अमेरिका लंबे समय तक लड़ पाएगा?
जानकारों का मानना है कि अमेरिका के पास पैसों की कमी नहीं है क्योंकि उनका रक्षा बजट बहुत बड़ा है. लेकिन असली चिंता पैसों की नहीं, बल्कि हथियारों के 'स्टॉक' की है. ईरान की मिसाइलों को रोकने के लिए जिन पैट्रियट और SM-6 इंटरसेप्टर मिसाइलों का इस्तेमाल हो रहा है, उनका भंडार सीमित है. इन्हें बनाने में बहुत वक्त लगता है और अमेरिका को इनका स्टॉक यूक्रेन और एशिया के दूसरे हिस्सों के लिए भी बचाकर रखना है. अगर यह जंग हफ्तों से खींचकर महीनों तक चली, तो हथियारों की कमी एक बड़ी चुनौती बन सकती है.
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