70% बच्चों को नींद न आने की समस्या, 7 साल के बच्चों को घेर रहा अकेलापन; नई रिसर्च में हुआ खुलासा

रिसर्च में शामिल तीन में से एक बच्चे ने नियमित रूप से चिंता और उदासी होने की शिकायत की. इसके अलावा 70% बच्चों ने नींद न आने की समस्या बताई.

रिसर्च में शामिल तीन में से एक बच्चे ने नियमित रूप से चिंता और उदासी होने की शिकायत की. इसके अलावा 70% बच्चों ने नींद न आने की समस्या बताई.

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Amit Kasana
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Anxiety, loneliness, low self-esteem, One in seven learners aged 7-11 report clinically significant emotional difficulties,  Cardiff University

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One in seven learners aged 7-11 report clinically significant emotional difficulties: हर सात में से एक बच्चा टेंशन, अकेलेपन और डर जैसी भावनात्मक परेशानियों से गुजर रहा है, जो इतनी गंभीर हैं कि उन्हें डॉक्टरों की मदद की जरूरत पड़ रही है.वहीं, 70% बच्चे नींद न आने की समस्या से जूझ रहे हैं.ये बातें 50000 बच्चों पर हुई नई रिसर्च में सामने आईं हैं।

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दरअसल, ये रिसर्च अमेरिका के वेल्स में स्थित करीब 500 प्राइमरी स्कूलों में की गई है.जहां बच्चों से उनकी दिनचर्या, खानपान की आदतों और रूटीन में आने वाली मानसिक व शारीरिक परेशानियों के बारे में सवाल किए गए.


भावनात्मक परेशानियों से गुजर रहे बच्चों को पड़ रही डॉक्टर की मदद की जरूरत  

शोध के बाद जारी हुई रिपोर्ट में चौंकाने वाले तथ्य सामने आए हैं.रिपोर्ट के मुताबिक जिन बच्चों पर शोध किया गया उनमें से हर सात में से एक बच्चा (लगभग 14%) ऐसी भावनात्मक परेशानियों से गुजर रहा है, जो इतनी गंभीर हैं कि उन्हें पेशेवर (डॉक्टर) मदद की जरूरत है.यानी औसतन हर क्लास में चार बच्चे इस श्रेणी में आते हैं.

हर तीन में से 1 बच्चा उदासी और परेशानी महसूस करता है

रिसर्च के अनुसार रिसर्च में शामिल तीन में से एक बच्चा नियमित रूप से चिंता, उदासी और परेशानी महसूस करता है.70% बच्चे अक्सर नींद की समस्या से जूझते हैं.वहीं, आधे से ज्यादा बच्चों ने स्कूल में धमकाए जाने (बुलिंग) किए जाने की शिकायत की.वहीं, आधे से कम बच्चे ही रोजाना फल-सब्जियां खाते हैं।

पहली बार है प्राइमरी स्कूल के बच्चों ने इतने बड़े स्तर पर की अपनी परेशानी शेयर 

रिसर्च से पता चला है कि प्राइमरी स्कूल के बच्चों में मानसिक स्वास्थ्य संबंधी चुनौतियां बढ़ी हैं.7 से 11 साल के बच्चों ने इस तरह की समस्या होने की बात कही है.बता दें अमेरिका की कार्डिफ यूनिवर्सिटी के डिसिफर प्रोग्राम के तहत स्कूल हेल्थ रिसर्च नेटवर्क (SHRN) द्वारा ये रिसर्च की गई थी.यह रिपोर्ट इसलिए भी महत्वपूर्ण हैं क्योंकि ये पहली बार है जब प्राइमरी स्कूल के बच्चों से इस तरह की परेशानी होने की बात कही है।

फोन पर ज्यादा टाइम बीताने वाले बच्चे फियर ऑफ मिसिंग आउट से पीड़ित

रिपोर्ट में बताया गया कि बच्चों के परिजनों से भी बात की गई.एक बच्चे की मां ने बताया कि 11 साल की उनकी बेटी स्कूल में बहुत सामान्य लगती है, लेकिन घर पर वो हर छोटी-बड़ी बात को लेकर बहुत आगे-आगे की सोचती है.उसे लगता है कि जो होने वाला है, वो सबसे बुरा होगा.एक परिजन ने कहा कि उनका 10 साल का बेटा रात भर फोन पर मैसेज देखता है और वह FOMO (फियर ऑफ मिसिंग आउट) से ग्रस्त है।

एक्सपर्ट ने बताए बदलाव के तरीके 

इस बारे में दिल्ली के एक सरकारी स्कूल में टीचर और मोटिवेशनल स्पीकर खविंद्र चौधरी का कहना है कि बच्चों को पढ़ाने की नीति में कुछ बदलाव करने की जरूरत है.अगर पढ़ाने के तरीके और व्यवहार में जल्द बदलाव नहीं किए गए तो कम उम्र में बच्चों में देखा जा रहा अकेलापन, गुस्सा और डर जैसे समस्याएं और गंभीर हो सकती हैं.

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