क्या होती है Digital Fasting? बच्चों से बुजुर्गों तक अलग-अलग उम्र में ये क्यों जरूरी, डॉक्टर से जानें इसके फायदे

Digital Fasting: हमने स्मार्टफोन के इर्द-गिर्द अपनी एक छोटी-सी दुनिया बना ली है. यह आदत बिलकुल ठीक नहीं है. ऐसे में डिजिटल फास्टिंग एक अच्छा उपाय बनकर सामने आया है. डॉक्टर भुपेश कुमार मनसुखानी से इसके बारे में जानते हैं.

Digital Fasting: हमने स्मार्टफोन के इर्द-गिर्द अपनी एक छोटी-सी दुनिया बना ली है. यह आदत बिलकुल ठीक नहीं है. ऐसे में डिजिटल फास्टिंग एक अच्छा उपाय बनकर सामने आया है. डॉक्टर भुपेश कुमार मनसुखानी से इसके बारे में जानते हैं.

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Akansha Thakur
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Digital Fasting

Digital Fasting

Digital Fasting: आज के समय में स्मार्टफोन हमारी जिंदगी का अहम हिस्सा बन चुका है. सुबह आंख खुलते ही मोबाइल हाथ में आ जाता है. टीवी चलता रहता है, लेकिन नजर फोन पर ही रहती है. सोशल मीडिया, वीडियो और व्लॉग्स ने हमें स्क्रीन से बांध दिया है. बच्चे हों या बुजुर्ग, हर कोई मोबाइल में व्यस्त नजर आता है. घूमने जाना भी अब सुकून के लिए नहीं, बल्कि कंटेंट बनाने के लिए होने लगा है. धीरे-धीरे हमने अपनी एक डिजिटल दुनिया बना ली है. लेकिन हर समय फोन से जुड़े रहना सेहत और रिश्तों के लिए ठीक नहीं माना जाता. ऐसे में डिजिटल फास्टिंग एक असरदार उपाय बनकर उभरी है. चलिए डॉक्टर से डिजिटल फास्टिंग के बारे में विस्तार से जानते हैं. 

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डिजिटल फास्टिंग क्या होती है?

डिजिटल फास्टिंग का मतलब है टेक्नोलॉजी के इस्तेमाल पर खुद की सीमा तय करना. इसमें दिन या हफ्ते में कुछ समय के लिए फोन, टैबलेट और लैपटॉप से दूरी बनाई जाती है. इस दौरान लोग केवल जरूरत के समय ही डिजिटल डिवाइस का इस्तेमाल करते हैं. इसे डिजिटल डिटॉक्स, डोपामाइन फास्टिंग, टेक्नोलॉजी से ब्रेक या डिजिटल सब्बाथ भी कहा जाता है.

डॉक्टर से जानें डिजिटल फास्टिंग के फायदे

गुरुग्राम के न्यूरोमेट वैलनेस के न्यूरोलॉजिस्ट डॉक्टर भुपेश कुमार मनसुखानी बताते हैं कि डिजिटल फास्टिंग अपनाने से जीवन में कई सकारात्मक बदलाव आते हैं. परिवार और दोस्तों के साथ रिश्ते बेहतर होते हैं. काम पर ध्यान बढ़ता है और उत्पादकता बढ़ती है.मानसिक तनाव कम होता है. सेहत में सुधार देखने को मिलता है. इसके अलावा खुद के लिए समय निकाल पाते हैं. 

डिजिटल फास्टिंग क्यों जरूरी हो गई है?

आज स्क्रीन से जुड़ी आदत लत में बदलती जा रही है. समय के साथ स्क्रीन टाइम लगातार बढ़ा है. भारत में 2019 के मुकाबले कुछ ही सालों में मोबाइल इस्तेमाल में बड़ी बढ़ोतरी देखी गई. अब लोग रोजाना औसतन करीब 6 घंटे फोन पर बिता रहे हैं. मोबाइल स्क्रीन पर समय बिताने के मामले में भारत दुनिया के टॉप देशों में शामिल हो चुका है.

बच्चों और बुजुर्गों में बढ़ती चिंता

डिजिटल फास्टिंग से बच्चों और बुजुर्गों की स्थिति और भी गंभीर हो गई है.  कई युवा रोजाना 8 घंटे तक ऑनलाइन रहते हैं. फोन और सोशल मीडिया का अधिक इस्तेमाल स्वभाव में चिड़चिड़ापन ला रहा है. मानसिक समस्याएं बढ़ रही हैं. नींद और एकाग्रता भी प्रभावित हो रही है.

डॉक्टर कब डिजिटल फास्टिंग की सलाह देते हैं?

जब फोन की लत से मानसिक और शारीरिक परेशानी बढ़ने लगती है, तब डॉक्टर डिजिटल फास्टिंग अपनाने की सलाह देते हैं. डिजिटल ब्रेक लेने से दिमाग को आराम मिलता है और जीवन में संतुलन बनता है.

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