/newsnation/media/media_files/2026/03/06/iran-israel-war-impact-on-india-2026-03-06-14-58-58.jpg)
मिडिल ईस्ट में बढ़ते सैन्य तनाव का असर अब वैश्विक व्यापार और उद्योगों पर भी दिखाई देने लगा है. ईरान पर यूएस और इजरायल के हमलों को एक सप्ताह बीत चुका है, लेकिन इसका प्रभाव केवल युद्ध क्षेत्र तक सीमित नहीं है. इसका असर अब अंतरराष्ट्रीय व्यापार मार्गों और खासकर ऑटोमोबाइल उद्योग पर भी पड़ने लगा है.
एशिया की कई बड़ी ऑटो कंपनियों के लिए मिडिल ईस्ट एक महत्वपूर्ण बाजार है, जहां हर साल अरबों डॉलर की कारों का निर्यात किया जाता है. मौजूदा हालात में समुद्री मार्गों की सुरक्षा को लेकर बढ़ती अनिश्चितता ने ऑटो कंपनियों की चिंता बढ़ा दी है.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज बना सबसे बड़ा जोखिम
एशिया से मिडिल ईस्ट तक वाहन निर्यात का बड़ा हिस्सा स्ट्रेट ऑफ हॉर्मुज से होकर गुजरता है. यह समुद्री मार्ग वैश्विक ऊर्जा और व्यापार के लिए बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है.
लेकिन मौजूदा युद्ध की स्थिति में यह आशंका बढ़ गई है कि इस क्षेत्र से गुजरने वाले व्यापारिक जहाजों पर हमले हो सकते हैं. अगर ऐसा होता है तो कार निर्यात करने वाली कंपनियों को भारी नुकसान उठाना पड़ सकता है.
जानकारों की मानें तो अगर शिपिंग मार्गों पर जोखिम बढ़ा तो बीमा लागत और परिवहन खर्च भी बढ़ जाएंगे, जिससे वाहन कंपनियों की सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है.
भारत के अलावा चीन के लिए दूसरा सबसे बड़ा विदेशी बाजार
मिडिल ईस्ट क्षेत्र चीन की ऑटो कंपनियों के लिए बेहद अहम बाजार है. आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2025 में चीन ने कुल 83.2 लाख कारों का निर्यात किया था.
चाइना पैसेंजर कार एसोसिएशन के मुताबिक, इनमें से लगभग 13.9 लाख कारें सिर्फ गल्फ देशों को भेजी गई थीं. इससे साफ है कि चीनी कंपनियों के लिए यह क्षेत्र दूसरा सबसे बड़ा विदेशी बाजार है.
अगर क्षेत्र में तनाव बढ़ता है या समुद्री रास्तों पर खतरा पैदा होता है तो चीन के ऑटो निर्यात को बड़ा झटका लग सकता है.
भारत के लिए भी अहम है मिडिल ईस्ट मार्केट
मिडिल ईस्ट भारतीय ऑटोमोबाइल उद्योग के लिए भी एक प्रमुख निर्यात बाजार है. वर्ष 2025 में भारत से लगभग 8.8 अरब डॉलर की कारों का निर्यात हुआ, जिसमें करीब 25 प्रतिशत गाड़ियां मिडिल ईस्ट देशों में भेजी गईं.
खास तौर पर सऊदी अरेबिया भारतीय कारों के लिए सबसे बड़े बाजारों में से एक है. कई भारतीय और अंतरराष्ट्रीय कंपनियां भारत में बनी गाड़ियों को गल्फ देशों में निर्यात करती हैं.
कोरियाई और जापानी कंपनियों की भी बड़ी हिस्सेदारी
मिडिल ईस्ट बाजार पर सिर्फ चीन और भारत ही निर्भर नहीं हैं, बल्कि दक्षिम कोरिया और जापान की कंपनियों की भी बड़ी हिस्सेदारी है. दक्षिण कोरिया ने 2025 में लगभग 72 अरब डॉलर का कार निर्यात किया था, जिसमें से 5.3 अरब डॉलर की गाड़ियां मिडिल ईस्ट भेजी गई थीं.
जापान की प्रमुख ऑटो कंपनी टोयोटा ने भी बड़ी संख्या में वाहनों को इस क्षेत्र में निर्यात किया. रिपोर्ट्स के अनुसार, 2025 में कंपनी ने जापान से 3.2 लाख से अधिक वाहन मिडिल ईस्ट भेजे थे. इसी तरह निसान मोटर भी भारत से बड़ी मात्रा में गाड़ियों का निर्यात इस क्षेत्र में करती है.
बढ़ती अनिश्चितता से कंपनियों की चिंता
मिडिल ईस्ट में जारी संघर्ष ने ऑटो कंपनियों के लिए जोखिम बढ़ा दिया है. अगर युद्ध लंबा चलता है और समुद्री मार्गों की सुरक्षा पर खतरा बढ़ता है, तो वाहन कंपनियों के लिए निर्यात करना मुश्किल हो सकता है.
विशेषज्ञों का मानना है कि किसी भी शिप पर हमला होने की स्थिति में कंपनियों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है. इसके अलावा सप्लाई चेन बाधित होने से उत्पादन और डिलीवरी पर भी असर पड़ सकता है.
कुल मिलाकर, मिडिल ईस्ट में जारी युद्ध केवल क्षेत्रीय संघर्ष नहीं है, बल्कि इसका असर वैश्विक व्यापार और ऑटोमोबाइल उद्योग पर भी पड़ने लगा है. आने वाले समय में इस संघर्ष की दिशा तय करेगी कि एशियाई ऑटो कंपनियों के लिए यह बाजार कितना सुरक्षित और स्थिर रह पाएगा.
यह भी पढ़ें - लो जी हो गई मौज: भरभराकर गिरी सोने-चांदी की कीमत, अब तक एक तोला गोल्ड खरीदने के लिए करना होगा इतना खर्च
/newsnation/media/agency_attachments/logo-webp.webp)
Follow Us