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Explainer: अमेरिका-इजरायल और ईरान के बीच चल रहे युद्ध को लेकर लगातार कई अपडेट सामने आ रहे हैं. इस जंग में ईरान ने न सिर्फ अमेरिका और इजरायल बल्कि 17 देशों के खिलाफ मोर्चा खोल दिया है. ईरान ने लगातार कई देशों में सैन्य ठिकानों को निशाना बना रहा है और विरोधियों को हथियारों को भी तबाह कर रहा है. ईरान का दावा है कि उसने अमेरिका और इजरायल समेत कई देशों के सैन्य ठिकानों को जेट को बर्बाद कर दिया है. लेकिन यहां सबसे बड़ा सवाल यह है कि आखिर ईरान किस हथियार के दम पर इस जंग में दम दिखा रहा है. इस हथियार का नाम है शाहेद 136. जी हां शाहेद 136 के सहारे ही ईरान ने अपने तेवर दिखाना शुरू किए हैं. आइए जानते हैं कि ये शाहेद 136 क्या है और कैसे ईरान ने इसके दम पर 17 देशों के ठिकानों को निशाना बनाया है.
खाड़ी देशों में शाहेद की दहशत
मध्य पूर्व में संघर्ष के दूसरे दिन हालात और गंभीर हो गए. रिपोर्ट्स के अनुसार, ईरान ने कुवैत से लेकर सऊदी अरब तक कई ठिकानों पर ड्रोन हमले किए। कुवैत में अमेरिकी सैन्य बेस को निशाना बनाए जाने का दावा किया गया, जबकि सऊदी अरब के तेल प्रतिष्ठानों पर भी हमले की खबरें सामने आईं. खास तौर पर रास तनूरा रिफायनरी को टारगेट किए जाने की बात कही जा रही है, जो सऊदी अरामको के संचालन के लिए अहम केंद्र है.
बताया जा रहा है कि हमलों में मुख्य रूप से ड्रोन का इस्तेमाल किया गया. अंतरराष्ट्रीय मीडिया की रिपोर्ट्स के मुताबिक, पहले दिन सैकड़ों ड्रोन उड़ाए गए और दूसरे दिन भी इसी रणनीति को दोहराया गया. इससे खाड़ी देशों की सुरक्षा व्यवस्थाओं पर सवाल खड़े हो गए हैं. शाहेद की दहशत पूरे खाड़ी देशों में मची हुई है.
ईरान का ‘शाहेद’ ड्रोन क्यों चर्चा में?
ईरान के हमलावर ड्रोन बेड़े में सबसे ज्यादा चर्चा Shahed 136 को लेकर है. यह तथाकथित 'लोइटरिंग म्यूनिशन' श्रेणी का ड्रोन है, जो लक्ष्य के ऊपर मंडराते हुए सही मौके पर विस्फोट कर सकता है. इससे पहले इसका इस्तेमाल रूस-यूक्रेन युद्ध में भी देखा गया था. इसे दुनिया के सबसे खतरनाक ड्रोन में से एक माना जाता है.
क्या है शाहेद 136 की ताकत
शाहेद-136 की मारक क्षमता लगभग 2000 किलोमीटर तक बताई जाती है और इसकी रफ्तार करीब 200 किमी प्रति घंटा है. कम लागत में तैयार होने वाला यह ड्रोन बड़े और महंगे सैन्य ठिकानों को नुकसान पहुंचाने की क्षमता रखता है. विशेषज्ञों का मानना है कि ऐसे ड्रोन पारंपरिक मिसाइलों के मुकाबले अधिक सस्ते और प्रभावी साबित हो सकते हैं.
ड्रोन रणनीति के पीछे की सोच
ईरान की ओर से बड़े पैमाने पर ड्रोन इस्तेमाल को एक रणनीतिक कदम माना जा रहा है. अमेरिकी थिंक टैंक रक्षा प्राथमिकता की मिडिल ईस्ट प्रोग्राम निदेशक रोस केलानिक के मुताबिक, कम लागत वाले हथियारों से ज्यादा महंगे सैन्य संसाधनों को निशाना बनाना एक “कॉस्ट-इफेक्टिव” रणनीति है. इससे विरोधी पक्ष पर आर्थिक और सामरिक दबाव बढ़ाया जा सकता है.
दूसरी ओर, ईरान के विदेश मंत्री अब्बास अराघची ने हालिया बयान में संकेत दिया कि देश लंबे समय से क्षेत्रीय रणनीति पर काम कर रहा है. उनका कहना है कि संघर्ष को लंबा खींचना और विरोधी को थकाना भी एक अहम पहलू हो सकता है.
मिसाइल बनाम ड्रोन: क्यों बदला फोकस?
विश्लेषकों का मानना है कि ईरान के पास सीमित संख्या में बैलिस्टिक मिसाइलें हैं, जिन्हें वह रणनीतिक रूप से सुरक्षित रखना चाहता है. ऐसे में ड्रोन एक सस्ता और लचीला विकल्प बनकर उभरे हैं. एक ओर जहां आधुनिक फाइटर जेट और एयर डिफेंस सिस्टम अरबों रुपये के होते हैं, वहीं ड्रोन की लागत अपेक्षाकृत बेहद कम है.
कम लागत और लंबी दूरी की क्षमता के कारण ड्रोन युद्ध का स्वरूप बदलते नजर आ रहे हैं. यह घटनाक्रम मध्य पूर्व में शक्ति संतुलन और वैश्विक ऊर्जा बाजार पर गहरा असर डाल सकता है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्षेत्रीय और वैश्विक शक्तियां इस नई ड्रोन-केंद्रित रणनीति का किस तरह जवाब देती हैं.
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