BRICS की चुप्पी पर उठे सवाल, ईरान-इजराइल जंग के बीच क्यों खामोश है दुनिया का बड़ा संगठन?

अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर जारी हमलों के बीच ब्रिक्स संगठन की चुप्पी ने वैश्विक राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. भारत की अध्यक्षता के दौरान संगठन का नरम रुख चर्चा में है. विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलते रणनीतिक हित और वैश्विक दबाव इस चुप्पी की बड़ी वजह हो सकते हैं.

अमेरिका और इजराइल द्वारा ईरान पर जारी हमलों के बीच ब्रिक्स संगठन की चुप्पी ने वैश्विक राजनीति में कई सवाल खड़े कर दिए हैं. भारत की अध्यक्षता के दौरान संगठन का नरम रुख चर्चा में है. विशेषज्ञ मानते हैं कि बदलते रणनीतिक हित और वैश्विक दबाव इस चुप्पी की बड़ी वजह हो सकते हैं.

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Ravi Prashant
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ईरान युद्ध पर ब्रिक्स की चुप्पी Photograph: (ANI)

अमेरिका, इजराइल और ईरान के बीच छिड़ी जंग को करीब एक हफ्ता बीत हो गया है, लेकिन दुनिया के एक बड़े गुट 'ब्रिक्स' ने अभी तक इस पर कोई खास प्रतिक्रिया नहीं दी है. ब्रिक्स में ईरान खुद भी एक मेंबर है, फिर भी इस संगठन का खामोश रहना जानकारों को हैरान कर रहा है. आमतौर पर जब भी इस तरह का कोई बड़ा संकट आता है, तो ब्रिक्स जैसे संगठन तुरंत अपनी राय रखते हैं, लेकिन इस बार ऐसा नहीं दिख रहा है. राजनीतिक जानकारों का कहना है कि यह चुप्पी काफी कुछ इशारा कर रही है, खासकर तब जब ईरान जैसा देश इस हमले की मार झेल रहा है.

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अब के रुख में जमीन-आसमान का फर्क

अगर हम पिछले साल के जून महीने की बात करें, तो हालात बिल्कुल अलग थे. जब इजराइल और ईरान के बीच 12 दिनों की लड़ाई हुई थी, तब ब्राजील ब्रिक्स का अध्यक्ष था. उस समय इस गुट ने तुरंत बयान जारी कर अमेरिका और इजराइल के हमलों को गलत बताया था और इसे अंतरराष्ट्रीय नियमों का उल्लंघन करार दिया था. लेकिन दिसंबर 2025 में जब से भारत ने ब्रिक्स की कमान संभाली है, संगठन का रुख पूरी तरह बदल गया है. अब संगठन किसी भी हमले की सीधी निंदा करने से बच रहा है.

क्या भारत की दोस्ती बन रही है चुप्पी की वजह?

कई जानकारों और आलोचकों का मानना है कि ब्रिक्स की इस चुप्पी के पीछे भारत का अपना हित छिपा है. भारत इन दिनों अमेरिका और इजराइल के काफी करीब जा रहा है. भारत के अपने रणनीतिक और व्यापारिक रिश्ते इन दोनों देशों के साथ मजबूत हो रहे हैं. यही वजह है कि भारत अब ब्रिक्स के मंच से कोई ऐसा बयान नहीं देना चाहता जिससे उसके इन दो बड़े दोस्तों के साथ रिश्तों में खटास आए. यह बदलाव साफ दिखाता है कि संगठन के सामूहिक लक्ष्यों पर अब देशों के निजी हित भारी पड़ रहे हैं.

आखिर क्या है यह ब्रिक्स और कौन है इसमें शामिल?

ब्रिक्स की शुरुआत साल 2009 में एक आर्थिक संगठन के तौर पर हुई थी. इसे अमीर देशों के समूह 'जी-7' के मुकाबले खड़े एक विकल्प के रूप में देखा जाता है. शुरुआत में इसमें ब्राजील, रूस, भारत, चीन और दक्षिण अफ्रीका शामिल थे, जिनके नाम के पहले अक्षरों से इसका नाम 'BRICS' पड़ा. साल 2024 के बाद इसमें और भी कई देश जुड़ गए, जिनमें ईरान, मिस्र, इथियोपिया, सऊदी अरब, संयुक्त अरब अमीरात और इंडोनेशिया शामिल हैं. अब यह 11 देशों का एक मजबूत संगठन है जो दुनिया की बड़ी आबादी और अर्थव्यवस्था का प्रतिनिधित्व करता है.

 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' और ईरान में मची तबाही

बता दें कि इस वक्त अमेरिका और इजराइल मिलकर ईरान पर 'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' चला रहे हैं. पिछले सात दिनों के भीतर ईरान के अलग-अलग हिस्सों में मिसाइलों और ड्रोनों से इतने हमले हुए हैं कि वहां चारों तरफ तबाही का मंजर है. सरकारी आंकड़ों के मुताबिक, इन हमलों में अब तक 1,230 से ज्यादा लोग अपनी जान गंवा चुके हैं. ईरान के कई महत्वपूर्ण सैन्य ठिकाने तबाह हो गए हैं. इन हमलों ने पूरे मिडिल ईस्ट की शांति को भंग कर दिया है और दुनिया भर में तेल की कीमतों से लेकर सुरक्षा तक के सवाल खड़े कर दिए हैं.

दक्षिण अफ्रीका ने उठाई शांति की पुरजोर आवाज

ब्रिक्स के सदस्य देशों में दक्षिण अफ्रीका ने इस युद्ध पर अपनी चिंता खुलकर जाहिर की है. वहां के राष्ट्रपति सिरिल रामफोसा ने कहा कि यह पागलपन अब रुकना चाहिए. उन्होंने चेतावनी दी कि अगर यह लड़ाई नहीं रुकी, तो यह पूरे मिडिल ईस्ट से बाहर भी फैल सकती है. दक्षिण अफ्रीका ने मांग की है कि तुरंत गोलीबारी रोकी जाए. दक्षिण अफ्रीका का कहना है कि वह इस मामले में बिचौलिया बनने को भी तैयार है ताकि बातचीत के जरिए इस खूनखराबे को खत्म किया जा सके.

रूस और चीन ने जताई अपनी सख्त नाराजगी

रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन ने भी अमेरिका और इजराइल के इन हमलों को गलत बताया है. खासकर शनिवार को हुए हमले में ईरान के सुप्रीम लीडर अयातुल्ला अली खामेनेई की मौत पर उन्होंने दुख जताया और इसे एक स्वतंत्र देश पर हमला करार दिया. वहीं चीन के विदेश मंत्री वांग यी ने भी इजराइल से बात करते हुए साफ कहा कि वे किसी भी तरह के सैन्य हमले के खिलाफ हैं. चीन का मानना है कि जब बातचीत से रास्ता निकल रहा था, तब हमला करना गलत था. रूस और चीन दोनों ईरान के साथ खड़े नजर आ रहे हैं, लेकिन वे भी सीधे तौर पर इस जंग में नहीं कूदना चाहते.

भारत का बहुत ही नपा-तुला और संभलकर दिया गया बयान

इस पूरी स्थिति में भारत का रुख सबसे अलग रहा है. हमलों के तीन दिन बाद भारत के विदेश मंत्रालय ने एक छोटा सा बयान जारी किया. इसमें भारत ने किसी की निंदा करने के बजाय सिर्फ यह कहा कि वे चाहते हैं कि यह जंग जल्दी खत्म हो. भारत ने 'बातचीत और कूटनीति' के पुराने रास्ते पर चलने की सलाह दी. भारत की चिंता यह भी है कि इस इलाके में हजारों भारतीय काम करते हैं, जिनकी सुरक्षा खतरे में पड़ सकती है. भारत का यह बयान किसी का पक्ष लेने के बजाय बीच का रास्ता निकालने जैसा था.

पीएम मोदी का इजराइल दौरा और टाइमिंग पर उठते सवाल

जंग शुरू होने के ठीक पहले, यानी 25 और 26 फरवरी को प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इजराइल के दौरे पर थे. वहां उन्होंने इजरायली पीएम बेंजामिन नेतन्याहू से मुलाकात की और कहा कि भारत हर मोड़ पर इजराइल के साथ खड़ा है. उन्होंने इजराइल की संसद को भी संबोधित किया. विपक्ष का कहना है कि जिस वक्त ईरान पर हमले की तैयारी हो रही थी, उस वक्त मोदी का वहां होना यह संकेत देता है कि भारत को शायद इन हमलों की जानकारी थी या उसने इस पर अपनी मौन सहमति दी थी. हालांकि सरकार ने इन बातों पर कोई जवाब नहीं दिया है.

अमेरिका का दबाव और भारत की मजबूरी

भारत और अमेरिका के बीच व्यापारिक रिश्तों में पिछले साल काफी उतार-चढ़ाव आया था. डोनाल्ड ट्रंप ने भारत से आने वाले सामान पर 50% तक टैक्स लगाने की धमकी दी थी, क्योंकि भारत रूस से सस्ता तेल खरीद रहा था. लेकिन फरवरी 2026 तक आते-आते बातचीत के बाद यह टैक्स घटाकर 18% कर दिया गया. खबर है कि भारत अब रूस से तेल कम खरीदेगा और अमेरिका से ज्यादा सामान लेगा. इस सौदे के बाद भारत के लिए अमेरिका के खिलाफ जाना या उसके द्वारा समर्थित इजराइली हमलों की निंदा करना काफी मुश्किल हो गया है.

क्या बिखर जाएगा ब्रिक्स देशों का यह संगठन?

ब्रिक्स के देशों के बीच अब आपसी मतभेद साफ नजर आने लगे हैं. जहां चीन और रूस जैसे देश अमेरिका के खिलाफ खड़े हैं, वहीं भारत और ब्राजील जैसे देश अपने व्यापार को बचाने के लिए अमेरिका के साथ तालमेल बिठा रहे हैं. इसी साल जनवरी में जब दक्षिण अफ्रीका में ब्रिक्स देशों का सैन्य अभ्यास हुआ था, तब भारत ने उसमें हिस्सा नहीं लिया था. जानकारों का कहना है कि अगर ब्रिक्स के देशों के बीच इसी तरह अलग-अलग राय रही, तो इस संगठन का भविष्य खतरे में पड़ सकता है. दुनिया अब यह देख रही है कि क्या यह गुट एकजुट होकर शांति के लिए कुछ कर पाएगा या सिर्फ एक नाम का संगठन बनकर रह जाएगा.

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