उत्तराखंड में RTI के तहत ऐतिहासिक फैसला, अब निचली अदालतों के जजों से जुड़े करप्शन और एक्शन की देनी होगी जानकारी

उत्तराखंड सूचना आयोग ने ऐतिहासिक आदेश देते हुए निचली अदालतों के जजों के खिलाफ दर्ज शिकायतों की संख्या और कार्रवाई की जानकारी RTI के तहत देने को कहा, जिससे न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी.

उत्तराखंड सूचना आयोग ने ऐतिहासिक आदेश देते हुए निचली अदालतों के जजों के खिलाफ दर्ज शिकायतों की संख्या और कार्रवाई की जानकारी RTI के तहत देने को कहा, जिससे न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ेगी.

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Deepak Kumar
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उत्तराखंड में सूचना का अधिकार (RTI) कानून के तहत एक ऐतिहासिक फैसला लिया गया है. उत्तराखंड सूचना आयोग ने आदेश दिया है कि अधीनस्थ (निचली) न्यायपालिका के न्यायाधीशों और अधिकारियों के खिलाफ दर्ज शिकायतों से जुड़ी जानकारी सार्वजनिक की जाए. यह देश में पहली बार होगा, जब इस तरह की जानकारी RTI के तहत उपलब्ध कराई जाएगी. बता दें कि यह फैसला उत्तराखंड सूचना आयोग की मुख्य सूचना आयुक्त राधा रतूड़ी की अध्यक्षता में दिया गया. आयोग ने उत्तराखंड हाईकोर्ट के जॉइंट रजिस्ट्रार को निर्देश दिया है कि सक्षम प्राधिकारी से अनुमति लेने के बाद शिकायतों से संबंधित जरूरी जानकारी उपलब्ध कराई जाए. हालांकि, किसी भी न्यायाधीश या अधिकारी का नाम या व्यक्तिगत पहचान सार्वजनिक नहीं की जाएगी.

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IFS अधिकारी ने की थी अपील

यह मामला भारतीय वन सेवा (IFS) के वरिष्ठ अधिकारी संजीव चतुर्वेदी से जुड़ा है, जो वर्तमान में हल्द्वानी में तैनात हैं. उन्होंने 14 मई 2025 को RTI आवेदन दाखिल कर अधीनस्थ न्यायपालिका से जुड़े सेवा नियम, आचरण नियम और अनुशासनात्मक कार्रवाई की प्रक्रिया की जानकारी मांगी थी. साथ ही उन्होंने 1 जनवरी 2020 से 15 अप्रैल 2025 के बीच न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ दर्ज शिकायतों की संख्या और उन पर हुई कार्रवाई का विवरण भी मांगा था.

नैनीताल हाईकोर्ट के लोक सूचना अधिकारी ने यह कहकर जानकारी देने से इनकार कर दिया था कि यह सूचना गोपनीय है और तीसरे पक्ष से जुड़ी हुई है. इसके बाद संजीव चतुर्वेदी ने पहले विभागीय अपील और फिर सूचना आयोग में द्वितीय अपील दायर की.

गोपनीयता के नाम पर जानकारी नहीं रोकी जा सकती- सूचना आयोग

सूचना आयोग में हुई सुनवाई के दौरान अपीलकर्ता ने दलील दी कि शिकायतों की संख्या और उन पर की गई कार्रवाई की जानकारी सार्वजनिक हित से जुड़ी है. वहीं लोक सूचना अधिकारी ने इसे संवेदनशील बताते हुए दोबारा गोपनीयता का हवाला दिया. दोनों पक्षों को सुनने के बाद आयोग ने साफ कहा कि केवल “गोपनीय” कह देने से सूचना रोकी नहीं जा सकती. आयोग ने माना कि शिकायतों की संख्या और कार्रवाई की प्रक्रिया पारदर्शिता के दायरे में आती है.

आयोग ने आदेश दिया कि सक्षम प्राधिकारी से अनुमति मिलने के बाद एक महीने के भीतर यह जानकारी अपीलकर्ता को दी जाए. जानकारों के अनुसार, यह फैसला न्यायिक व्यवस्था में पारदर्शिता बढ़ाने की दिशा में एक बड़ा कदम है और भविष्य में RTI मामलों के लिए नजीर बनेगा.

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