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काशी के कण-कण में बसते हैं शंकर,जानें क्या है पाकिस्तानी महादेव का सच

शीतला घाट पर ऐसे ही एक शिवलिंग की चर्चा लोगों में कौतूहल पैदा करती है. इसे लोग पाकिस्तानी महादेव के नाम से जानते हैं.

News Nation Bureau | Edited By : Pradeep Singh | Updated on: 23 Nov 2021, 10:46:53 PM
Mahadev

पाकिस्तानी महादेव (Photo Credit: News Nation)

highlights

  • शीतला घाट पर स्थापित शिवलिंग को पाकिस्तानी महादेव के नाम से जानते हैं
  • इस मंदिर की स्थापना के लिए बूंदी स्टेट ने स्थान दिया गया था
  • काशी को भगवान शिव का निवास-स्थान माना जाता है

वाराणसी:

काशी को संसार के सबसे पुराने नगरों में से एक माना जाता है. काशी को भगवान शिव का निवास-स्थान माना जाता है. काशी बोलते ही लोगों की जुबान पर महादेव का नाम आ जाता है. यहां के घाटों और संकरी गलियों में प्राचीन काल से ही तमाम शिवलिंगों की स्थापना की गई है. जो आज भी लोगों के लिए आस्था के केंद्र बने हुए हैं. मछोदरी इलाके से कुछ दूर शीतला घाट पर ऐसे ही एक शिवलिंग की चर्चा लोगों में कौतूहल पैदा करती है. इसे लोग पाकिस्तानी महादेव के नाम से जानते हैं. स्थानीय लोगों के अनुसार सरकारी दस्तावेजों में भी इस मंदिर का नाम पाकिस्तानी महादेव के नाम से दर्ज है. अब सवाल यह उठता है कि इस मंदिर का नाम पाकिस्तान से क्यों जोड़ा जाता है. 

यह बात सन 1947 हिंदुस्तान और पाकिस्तान के बंटवारे के समय की है. उन दिनों देश में हालात कुछ ठीक नहीं थे. पूरा देश दंगों की आग में जल रहा था. इसी दौरान बंगाल में भी दंगा भड़कने से वहां के लोग देश के अन्य हिस्सों में पलायन को मजबूर हो गए. इनमें से एक जानकी बाई बोगड़ा का परिवार भी जो पहले काशी के ही रहने वाले थे. पश्चिम बंगाल से पलायन कर फिर से यहां आ गए.

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बंगाल में जहां इनका परिवार रहता था, उन्होंने वहीं एक शिवलिंग की स्थापना की थी. जिसे पलायन के समय काशी ले आए. परिवार के साथ जब ये मछोदरी स्थित शीतला घाट किनारे गंगा में शिवलिंग का विसर्जन करने लगे तो वहां के कुछ पुरोहितों ने उन्हें विसर्जन करने से रोका और मंदिर की स्थापना कराई. बंटवारे के दौरान पश्चिम बंगाल से लाए गए इस शिवलिंग का लोगों ने नाम भी पाकिस्तानी महादेव रख दिया. जिसे आज भी इसी नाम से पूजा जाता है.

मंदिर के पुजारी अजय कुमार शर्मा ने बताया कि इस मंदिर की स्थापना के लिए बूंदी स्टेट के अखाड़ा परिषद द्वारा स्थान दिया गया था. जिसे रघुनाथ व मुन्नू महाराज के सहयोग से स्थापित कराया गया. बाद में कई लोगों द्वारा मंदिर की पूजा का दायित्व लिया. 2008 से हम यहां पूजा अर्चना करते हैं. हमारी अनुपस्थिति में परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा नियमित पूजा की जाती है.

First Published : 23 Nov 2021, 10:45:54 PM

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