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नेताजी ने ऐसी झोंकी थी अंग्रेजों की आंखों में धूल, इस तरह चंगुल से भाग निकले

बोस बीरभूम जिले के बोलपुर के शांति निकेतन गए, जहां उन्होंने दिल्ली पहुंचने से पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर से आशीर्वाद लिया और फिर से बर्दवान जिला लौट आए.

News Nation Bureau | Edited By : Nihar Saxena | Updated on: 22 Jan 2021, 04:06:33 PM
Netaji Great Escape

जीटी रोड का रास्ता तय कर पहुंचे पेशावर फिर वहां से मॉस्को. (Photo Credit: न्यूज नेशन)

कोलकाता:

वर्ष 1941 में 44 वर्षीय सुभाष चंद्र बोस (Subhash Chandra Bose) को दक्षिण कोलकाता में उनके एल्गिन रोड स्थित आवास पर नजरबंद (हाउस अरेस्ट) किया गया था और उनके घर के बाहर पूरा क्षेत्र पुलिस की निगरानी में था. विख्यात नेताजी शोधार्थी जयंत चौधरी के अनुसार, नेताजी 16 जनवरी 1941 को काले रंग की जर्मन वांडरर सेडान कार से अंग्रेजों को चकमा देकर भाग निकले थे. उन्होंने इसी कार से एल्गिन रोड से एजेसी रोड और फिर महात्मा गांधी रोड से होते हुए हावड़ा ब्रिज के माध्यम से हुगली नदी को पार करते हुए हावड़ा जिले में प्रवेश किया था. इसके बाद राज्य की राजधानी से लगभग 100 किलोमीटर दूर स्थित बर्दवान जिले तक पहुंचने के लिए कार ने जीटी रोड का सफर भी तय किया.

गुरुदेव से लिया था आशीर्वाद
बोस बीरभूम जिले के बोलपुर के शांति निकेतन गए, जहां उन्होंने दिल्ली पहुंचने से पहले नोबेल पुरस्कार विजेता रवींद्रनाथ टैगोर से आशीर्वाद लिया और फिर से बर्दवान जिला लौट आए. बर्दवान से उन्होंने 'फ्रंटियर मेल' नामक एक ट्रेन पकड़ी और मोहम्मद जियाउद्दीन के भेष में दिल्ली पहुंचे. एक थ्योरी यह भी है कि बोस ने गोमो स्टेशन से कालका मेल पकड़ी और दिल्ली पहुंचे, जो कि अब झारखंड में है. संभवतः इसीलिए 1941 में ब्रिटिश साम्राज्य के चंगुल से बाहर निकलने वाले बोस के सम्मान में 2009 में गोमो रेलवे स्टेशन का नाम बदलकर नेताजी सुभाष चंद्र बोस गोमो रेलवे स्टेशन कर दिया गया था. 

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पेशावर से गए थे काबुल
नेताजी दिल्ली से सबसे पहले पाकिस्तान के पेशावर पहुंचे और वहां से काबुल पहुंचे, जहां उन्हें लगभग 48 दिनों तक इंतजार करना पड़ा. काबुल से वे समरकंद पहुंचे और वहां से वह हवाई मार्ग से मास्को गए और आखिरकार वह मार्च 1941 में बर्लिन पहुंच गए. नेताजी के एल्गिन रोड स्थित आवास से भाग निकलने को लेकर कई थ्योरी हैं. हालांकि सबूतों के अनुसार बोस को उनके एक करीबी सहयोगी सरदार निरंजन सिंह तालिब ने निकाला था न कि शिशिर बोस ने.

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हावड़ा-कालका का नाम अब नेताजी एक्सप्रेस
बोस की परपौत्री (भांजी, बहन की नातिन) और एबीएचएम की राष्ट्रीय अध्यक्ष राज्यश्री चौधरी ने भी इस घटनाक्रम को याद करते हुए कहा कि सिख समुदाय ने बोस को भारत से भागने में मदद की थी और शिशिर बोस के बारे में बताई गई बातों की कोई प्रासंगिकता नहीं है. गौरतलब है कि केंद्र ने 23 जनवरी को नेताजी की जयंती को 'पराक्रम दिवस' के रूप में मनाने का फैसला किया है. भारतीय रेलवे ने बुधवार को नेताजी की 125वीं जयंती समारोह से पहले हावड़ा-कालका मेल का नाम बदलकर 'नेताजी एक्सप्रेस' कर दिया है. इस जानकारी को साझा करते हुए पीयूष गोयल ने ट्वीट करते हुए लिखा, नेताजी के पराक्रम ने भारत को स्वतंत्रता और विकास के एक्सप्रेस मार्ग पर पहुंचा दिया. मैं 'नेताजी एक्सप्रेस' की शुरुआत के साथ उनकी जयंती मनाने के लिए रोमांचित हूं.

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First Published : 22 Jan 2021, 04:06:33 PM

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