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अफगानिस्तान की उलझी सच्चाई और तालिबान की कमजोरियां

आईएसकेपी को अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा लगभग समाप्त कर दिया गया था, लेकिन इसे पाकिस्तान द्वारा पोषित किया गया है.

News Nation Bureau | Edited By : Nihar Saxena | Updated on: 29 Aug 2021, 11:11:30 AM
Taliban Afghanistan

इंडिया नैरेटिव ऐसे गैर-राष्ट्र एक्टर्स को देखता है दो दमनकारी है. (Photo Credit: न्यूज नेशन)

highlights

  • तालिबान शासित अफगानिस्तान दुनिया का पहला आतंकवादी राष्ट्र
  • तालिबान के खिलाफ सक्रिय है खुरासान मॉडल, जो पाक का भी विरोधी
  • अलग-अलग आतंकी समूह अफगानिस्तान को और तबाह-बर्बाद करेंगे

नई दिल्ली:

काबुल (Kabul) हवाईअड्डे पर हुए घातक बम विस्फोटों ने दो चीजों को उजागर किया है. एक तो सत्तारूढ़ तालिबान (Taliban) की कमजोरियां और दूसरी अफगानिस्तान (Afghanistan) की कमजोर वास्तविकता जिस पर हर तरह के आतंकवादी हावी हैं. लगभग चार दशकों के संघर्ष ने एक अराजक क्षेत्र को जन्म दिया है, जो अफगानिस्तान की जटिल जातीय, आदिवासी, क्षेत्रीय और धार्मिक पहचान से जटिल है. इसके साथ ही पाकिस्तान (Pakistan) में एक असफल राष्ट्र की हताशा और अपनी सेना के माध्यम से सब कुछ ठीक करने का अमेरिकी निर्धारण भी इसी पहलू में जुड़ता है. इंडिया नैरेटिव ऐसे गैर-राष्ट्र एक्टर्स को देखता है, जो लड़ाई करेंगे और अफगान पुरुषों, महिलाओं और बच्चों पर शासन करने की कोशिश करेंगे. यह मानते हुए कि वे हथियारों से भरे हुए हैं और एक जिहादी विचारधारा का दावा करते हैं.

भारतीय उपमहाद्वीप में इस्लामिक खिलाफत की स्थापना
अगर अलकायदा की बात करें तो 2001 में अमेरिका के अफगानिस्तान में आने का मुख्य कारण वर्ल्ड ट्रेड सेंटर और पेंटागन के ट्विन टावर्स पर अल-कायदा के हमले थे. अमेरिकियों ने अपने जीवन में पहली बार अपनी ही धरती पर खतरा महसूस किया. तालिबान के साथ अंतर्राष्ट्रीय ताकतों के खिलाफ लड़ने के बाद, अल-कायदा अफगानिस्तान की वर्तमान व्यवस्था से निकटता से जुड़ा हुआ है और तालिबान के बयान से स्पष्ट है कि ओसामा बिन लादेन ट्विन टावर हमलों से संबंधित नहीं था. अल-कायदा द्वारा एक अलग समूह के रूप में बनाया गया है. एक्यूआईएस इस क्षेत्र में अपनी उपस्थिति को मजबूत करने और स्थानीय आतंकदियों को बनाने पर केंद्रित है. सत्ता में आने के बाद तालिबान ने अलकायदा के आतंकियों को जेलों से रिहा कर दिया है, जो दोनों गुटों के बीच घनिष्ठ संबंधों की ओर इशारा करता है. एक्यूआईएस का मुख्य उद्देश्य भारतीय उपमहाद्वीप में एक इस्लामिक खिलाफत स्थापित करना है.

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आईएसकेपी है गंभीर खतरा
इस्लामिक स्टेट-खुरासान प्रांत (आईएसकेपी) के बारे में बात की जाए तो कई विशेषज्ञों का मानना है कि इस्लामिक स्टेट इन इराक एंड सीरिया (आईएसआईएस) को अफगानिस्तान में आईएसआईएस-के रूप में जाना जाता है, जिसमें खुरासान अफगानिस्तान-पाकिस्तान क्षेत्र पर केंद्रित है. प्रमुख कट्टरपंथियों का यह समूह तालिबान के खिलाफ है, क्योंकि यह तालिबान को कम इस्लामी मानता है. इसके कुछ सबसे विनाशकारी हमले अल्पसंख्यकों पर हुए हैं. अफगान सिखों के साथ-साथ शिया हजारा समुदाय पर भी इसके हमले देखे गए हैं. कुछ दिन पहले ही बाइडेन प्रशासन ने चेतावनी दी थी कि यह समूह अमेरिकियों पर हमला कर सकता है, जो अंतत: काबुल हवाई अड्डे पर हुआ.

तालिबान है मुख्य प्रतिद्वंद्वी
वकील और भू-राजनीतिक विश्लेषक, मार्क किनरा ने इंडिया नैरेटिव को बताया कि आईएसकेपी आईएसआईएस की इस्लामी कानून की सख्त व्याख्या के आधार पर विश्व व्यवस्था को एक वैश्विक इस्लामिक स्टेट के साथ बदलना चाहता है. आईएसकेपी अपने कैडर को असंतुष्ट तालिबान सदस्यों और पाकिस्तान मदरसों से खींचता है. आईएसकेपी को अफगानिस्तान में अमेरिका द्वारा लगभग समाप्त कर दिया गया था, लेकिन इसे पाकिस्तान द्वारा पोषित किया गया है. माना जाता है कि बचे हुए आतंकवादी खुद को फिर से संगठित कर रहे हैं, जो तालिबान के लिए एक चुनौती बन जाएगा, जो अब देश पर शासन करना चाहता है. अपनी कट्टर विचारधारा के चलते इसके तालिबान से टकराव होने की संभावना है. यह सभी पृष्ठभूमि और समूहों के चरमपंथी आतंकवादियों को भी आकर्षित करता है.

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टीएचएन है अल-कायदा के करीबी
अगर हक्कानी नेटवर्क (टीएचएन) की बात करें तो यह सुन्नी आतंकवादी समूह तालिबान सरकार का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और अल-कायदा के करीब है. यह पाकिस्तान की खुफिया एजेंसियों के करीबी होने के लिए भी मशहूर है. पाकिस्तान के उत्तरी वजीरिस्तान में अपने बेस के साथ, टीएचएन पाकिस्तानी सेना की शरण में स्वतंत्र रूप से काम करता है. पाकिस्तान इसे विशेष रूप से भारत के खिलाफ एक उपयोगी सहयोगी मानता है और अफगानिस्तान में भारतीय परियोजनाओं पर हमला करने के लिए इसका इस्तेमाल करता था. काबुल में भारतीय दूतावास, अमेरिकी दूतावास और अन्य स्थलों पर आत्मघाती बम विस्फोट इसी समूह द्वारा सुनियोजित थे. टीएचएन ने अब तक के सबसे बड़े ट्रक बमों में से एक बनाया था, जिसे अफगानों ने एक अमेरिकी बेस के पास इंटरसेप्ट किया था.

टीटीपी से है पाकिस्तान को खतरा
तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) की बात की जाए तो यह उन चुनिंदा आतंकी संगठनों में से एक है, जो पाकिस्तान के खिलाफ काम करता है. इसे पाकिस्तानी तालिबान भी कहा जाता है. यह एक पश्तून समूह है जिसकी उत्पत्ति अफगान-पाक कबायली बहुल सीमा पर हुई है. पाकिस्तानी सेना द्वारा पाकिस्तान में शरण लिए हुए विदेशी आतंकवादियों को खदेड़ने के लिए अपने कबायली इलाकों में अभियान शुरू करने के बाद समूह गठित हुआ था. इस कार्रवाई ने स्थानीय पश्तून जनजातियों को नाराज कर दिया था, जिनमें से कई पाकिस्तानी सेना और सरकार के खिलाफ हो गए थे. प्रकृति में पाकिस्तान विरोधी होने के बावजूद, टीटीपी तालिबान के साथ घनिष्ठ रूप से जुड़ा हुआ है, जिसने सत्ता में आने के बाद हाल ही में जेल में बंद अपने लड़ाकों को मुक्त कराया है. टीटीपी से पाकिस्तानी सरकार और तालिबान सरकार के बीच तनातनी होने की संभावना है. इस्लामाबाद पहले से ही तालिबान शासकों पर टीटीपी गतिविधियों पर अंकुश लगाने और लड़ाकों को बसने के लिए पाकिस्तान वापस भेजने का दबाव बना रहा है. आवारा आतंकवादी समूह अपने मतभेदों को कैसे सुलझाएंगे और अलग-अलग उद्देश्यों में तालमेल कैसे बिठाएंगे यह आने वाले समय में ही स्पष्ट होगा.

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ईटीआईएम चीन के उइगर मुसलमानों के साथ
पूर्वी तुर्किस्तान इस्लामिक मूवमेंट (ईटीआईएम) की बात की जाए तो यह एक ऐसा समूह है जो चीन के लिए किसी बुरे सपने की तरह बना हुआ है. बीजिंग चिंतित है कि समूह इसके शिनजियांग क्षेत्र में समस्याओं को भड़काएगा जो पाकिस्तान और अफगानिस्तान की सीमा में है. ऐसा माना जाता है कि ईटीआईएम ने तालिबान को अफगान सीमा पर बदख्शां प्रांत जीतने में मदद की थी. चीन ईटीआईएम से डरता है, क्योंकि समूह उइगरों के लिए एक स्वतंत्र राष्ट्र बनाना चाहता है. लश्कर-ए-झांगवी (एलईजे) के बारे में बात की जाए तो इसके लड़ाके काबुल में अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे की ओर जाने वाली चौकियों पर तैनात हैं. इस समूह का उद्देश्य शिया मुसलमानों और अन्य धार्मिक अल्पसंख्यकों को खत्म करना है. टीटीपी के करीब, यह पाकिस्तान में शरिया के तहत एक इस्लामिक स्टेट स्थापित करना चाहता है.

उज्बेकिस्तान का इस्लामी आतंकी कनेक्शन
उज्बेकिस्तान का इस्लामी आंदोलन के बारे में किनरा का कहना है कि यह समूह उज्बेकिस्तान के लिए एक चुनौती है, जो अफगानिस्तान की उत्तरी सीमा पर स्थित है. उन्होंने कहा, 'इसका उद्देश्य इस्लामी राज्य की स्थापना के लिए उज्बेक सरकार को उखाड़ फेंकना है और अफगान धरती से विदेशी उपस्थिति को खत्म करने में तालिबान के साथ भी है. अन्य दो समूह जो अफगान-पाक क्षेत्र में काम करते हैं, वे हैं लश्कर और जेईएम - दोनों ही पाकिस्तान द्वारा संचालित हैं. दोनों जम्मू-कश्मीर को पाकिस्तान में मिलाना चाहते हैं और भारत में आतंकवाद को बढ़ावा दे रहे हैं। ये भारत के लिए सबसे बड़ा खतरा भी हैं.'

First Published : 29 Aug 2021, 11:08:59 AM

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