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सांकेतिक तस्वीर
Explainer: पश्चिम एशिया एक बार फिर बड़े भू-राजनीतिक संकट की ओर बढ़ता दिख रहा है. अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ती तल्खी, सैन्य धमकियां और कूटनीतिक आरोप-प्रत्यारोप ने पूरी दुनिया की चिंता बढ़ा दी है. सवाल यह नहीं है कि तनाव है या नहीं, बल्कि यह है कि अगर हालात युद्ध या सत्ता परिवर्तन तक पहुंचे, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान किसे होगा भारत को या चीन को?
कैसे रहे हैं अमेरिका के ईरान से रिश्ते
अमेरिका और ईरान के रिश्ते पिछले चार दशकों से तनावपूर्ण रहे हैं. 1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद ईरान ने खुद को अमेरिकी प्रभाव से अलग कर लिया, जिसके बाद परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध और पश्चिम एशिया में वर्चस्व की लड़ाई ने टकराव को और गहरा किया. आज हालात ऐसे हैं कि किसी भी बड़ी चूक से पूरा क्षेत्र अस्थिर हो सकता है.
आंतरिक स्थिति भी है कमजोर
ईरान की आंतरिक स्थिति भी मजबूत नहीं है. भारी अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते उसकी अर्थव्यवस्था दबाव में है. मुद्रा कमजोर है, महंगाई चरम पर है और जनता में असंतोष बढ़ रहा है. हालांकि अब तक सत्ता कायम है, लेकिन बाहरी हस्तक्षेप की आशंका लगातार बनी हुई है.
चीन का ईरान से कुछ ऐसा है रिलेशन
इस पूरे समीकरण में सबसे अहम भूमिका चीन की बनती है. चीन और ईरान सिर्फ राजनीतिक साझेदार नहीं हैं, बल्कि गहरे आर्थिक सहयोगी भी हैं. साल 2021 में दोनों देशों के बीच 25 साल का रणनीतिक समझौता हुआ, जिसकी अनुमानित कीमत करीब 400 अरब डॉलर बताई जाती है. इस डील के तहत चीन ईरान के ऊर्जा, इंफ्रास्ट्रक्चर, ट्रांसपोर्ट और उद्योग क्षेत्रों में बड़े निवेश कर रहा है. ईरान, चीन के बेल्ट एंड रोड इनिशिएटिव का भी अहम हिस्सा है.
चीन को है सबसे बड़ा फायदा
सबसे बड़ा फायदा चीन को ईरान के सस्ते तेल से मिलता है. अमेरिकी प्रतिबंधों के बावजूद ईरान का कच्चा तेल चोरी-छिपे या वैकल्पिक रास्तों से चीन तक पहुंचता है. माना जाता है कि रोजाना करीब 15 लाख बैरल तेल चीन आयात करता है, जो बाजार से सस्ता होता है. इससे चीन को अरबों डॉलर की बचत होती है और उसकी ऊर्जा सुरक्षा मजबूत रहती है.
सत्ता पलटी तो किसका होगा नुकसान
अगर अमेरिका के दबाव या हस्तक्षेप से ईरान में सत्ता परिवर्तन होता है और वहां अमेरिका समर्थित सरकार आती है, तो यह पूरा समीकरण पलट सकता है. चीन को मिलने वाला सस्ता तेल बंद हो सकता है, बेल्ट एंड रोड के प्रोजेक्ट अटक सकते हैं और अरबों डॉलर का निवेश खतरे में पड़ सकता है. यानी सबसे बड़ा झटका सीधे चीन को लगेगा.
भारत की कैसी होगी हालत
भारत की स्थिति इससे अलग है. भारत ने पहले ही अमेरिकी प्रतिबंधों के चलते ईरान से तेल आयात काफी हद तक बंद कर दिया है. भारत के लिए चाबहार बंदरगाह रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण जरूर है, लेकिन कुल मिलाकर भारत की ईरान पर आर्थिक निर्भरता सीमित है. इसलिए भारत को नुकसान हो सकता है, लेकिन वह चीन जितना गहरा और दीर्घकालिक नहीं होगा.
निष्कर्ष साफ है अगर ईरान में बड़ा भू-राजनीतिक उलटफेर होता है, तो इसका सबसे बड़ा नुकसान चीन को हो सकता है, जबकि भारत अपेक्षाकृत सुरक्षित स्थिति में रह सकता है.
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