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नए CJI जस्टिस यूयू ललित ने फौरन बुलाई Full Court Meeting, पूरी जानकारी

Written By : केशव कुमार | Edited By : Keshav Kumar | Updated on: 29 Aug 2022, 11:33:46 AM
full court

फुल कोर्ट मीटिंग क्या है (Photo Credit: News Nation)

highlights

  • फुल कोर्ट मीटिंग का शाब्दिक अर्थ पूर्ण न्यायालय की बैठक है
  • भारत के CJI के विवेक पर ही फुल कोर्ट मीटिंग बुलाई जाती है
  • फुल कोर्ट मीटिंग के आयोजन को लेकर कोई लिखित नियम नहीं

नई दिल्ली:  

भारत के नए मुख्य न्यायाधीश (CJI) यू यू ललित ( Justice UU Lalit) ने शनिवार को कार्यभार संभालने के कुछ घंटों के भीतर ही पूर्ण न्यायालय की एक बैठक (Full Court Meeting) बुलाई. बैठक में न्यायाधीशों ने मामलों की लिस्टिंग और बैकलॉग से संबंधित मुद्दों से कैसे निपटा जाए के मसले पर चर्चा की. आइए, जानते हैं कि फुल कोर्ट मीटिंग क्या है और उसे कब आयोजित किया जाता है? इसके अलावा इस महत्वपूर्ण न्यायिक बैठक की जरूरत क्या है?

फुल कोर्ट मीटिंग कब आयोजित होता है?

फुल कोर्ट मीटिंग का शाब्दिक अर्थ पूर्ण न्यायालय की बैठक है. इसमें न्यायालय के सभी न्यायाधीश भाग लेते हैं. हालांकि इसके आयोजन को लेकर कोई लिखित नियम नहीं हैं. न्यायालयीन परंपरा के अनुसार, न्यायपालिका के महत्व के मुद्दों पर चर्चा करने के लिए भारत के मुख्य न्यायाधीश द्वारा पूर्ण-न्यायालय की बैठकें बुलाई जाती हैं. उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालयों में वकालत करने वाले अधिवक्ताओं के वरिष्ठ पदनाम भी पूर्ण न्यायालय की बैठकों के दौरान तय किए जाते हैं.

पूर्ण न्यायालय बैठक का क्या महत्व है?

मूल विचार सबको साथ लेकर चलना है. पूर्ण अदालत की बैठकें देश की कानूनी व्यवस्था को घेरने वाली समस्याओं से निपटने के लिए आम समाधान पर पहुंचने और अदालत की प्रशासनिक प्रथाओं में अगर आवश्यक हो तो कोई भी संशोधन करने का एक आदर्श अवसर होता है.

यह कितनी बार आयोजित किया जाता है?

चूंकि भारत के मुख्य न्यायाधीश के विवेक पर पूर्ण न्यायालय की बैठक बुलाई जाती है. इसलिए यह किसी विशेष कैलेंडर का पालन नहीं करता है. पूर्व में कई बार पूर्ण न्यायालय की बैठकें हो चुकी हैं. इन बैठकों में अहम निर्णय भी लिए गए हैं.

पहले की फुल कोर्ट मीटिंग्स की अहम चर्चाएं

मार्च 2020 में, वकीलों के संघों द्वारा कोविड -19 के प्रकोप और अदालत के कर्मचारियों के बीच इसके बाद के प्रसार के बाद अगली सूचना तक अदालत को बंद करने और आगे के कदमों का फैसला करने के लिए मांगों पर चर्चा करने के लिए बुलाई गई थी.

इसके अलावा, 7 मई, 1997 को हुई एक पूर्ण अदालत की बैठक में निर्णय लिया गया था कि "प्रत्येक न्यायाधीश को अपनी सभी संपत्तियों की घोषणा अचल संपत्ति या निवेश के रूप में करनी चाहिए." यानी अपने नाम पर या पति या पत्नी या किसी भी आश्रित व्यक्ति के नाम पर भी तो इसको सामने लाना चाहिए. कानूनी भाषा में कहें तो किसी भी संपत्ति में पर्याप्त प्रकृति का अधिग्रहण किया जाता हो तो एक उचित समय के भीतर और उसके बाद इसका एक सार्वजनिक प्रकटीकरण करें.

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न्यायाधीशों पर कार्रवाई को लेकर भी विचार

बैठक में निर्णय लिया गया कि भारत के माननीय मुख्य न्यायाधीश द्वारा उन न्यायाधीशों के खिलाफ उपयुक्त उपचारात्मक कार्रवाई करने के लिए एक आंतरिक प्रक्रिया तैयार की जानी चाहिए, जो अपनी चूक या कमीशन के कृत्यों द्वारा न्यायिक जीवन के सार्वभौमिक रूप से स्वीकृत मूल्यों का पालन नहीं करते हैं.  "न्यायिक जीवन के मूल्यों का पुनर्कथन" में जो सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट के न्यायाधीशों द्वारा पालन और पालन किए जाने वाले कुछ न्यायिक मानकों और सिद्धांतों को निर्धारित करता है.

First Published : 29 Aug 2022, 10:05:02 AM

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