Explainer: ओमान में अमेरिका-ईरान की 'परमाणु' मुलाकात, क्या पिघलेगी दशकों की बर्फ?

Iran US relations: 1980 के दशक में इराक-ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका ने इराक का साथ दिया जिससे ईरान में अमेरिका विरोधी भावनाएं और मजबूत हुईं.

Iran US relations: 1980 के दशक में इराक-ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका ने इराक का साथ दिया जिससे ईरान में अमेरिका विरोधी भावनाएं और मजबूत हुईं.

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Amit Kasana
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प्रतिकात्मक फोटो

Iran US relations: ईरान और अमेरिका के बीच रिश्ते हमेशा से एक पहेली की तरह रहे हैं. कभी दोस्ती के करीब, कभी दुश्मनी ये दोनों देश हमेशा झुलसते ही रहे हैं. आज 6 फरवरी 2026 को ओमान की राजधानी मस्कट में दोनों देशों के प्रतिनिधि मिल रहे हैं, जो 9 महीने बाद दोनों देशों के बीच पहली ऐसी बैठक है, जिसमें दोनों अपने भविष्य के रिश्तों के बारे में चर्चा करेंगे. जानकारी के अनुसार यह मुलाकात मुख्य रूप से ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर केंद्रित है लेकिन इसके पीछे छिपे मुद्दे इतने गहरे हैं कि भविष्य की राह आसान नहीं लगती. आइए इन रिश्तों की जड़ों को समझते हैं, आज की बैठक के मायने जानते हैं और आगे क्या हो सकता है इस पर भी चर्चा करते हैं. 

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रिश्तों की ऐतिहासिक जड़ें और अमेरिका-ईरान की दोस्ती व दुश्मनी 

ईरान और अमेरिका के संबंधों की शुरुआत 1950-60 के दशक में काफी मजबूत थी. अमेरिका ईरान के शाह मोहम्मद रेजा पहलवी का बड़ा समर्थक था जो तेल के कारोबार और कम्युनिस्ट प्रभाव रोकने में मददगार साबित होता था. लेकिन 1979 की इस्लामिक क्रांति ने सब उलट दिया. आयतोल्लाह खुमैनी के नेतृत्व में शाह को सत्ता से हटाया गया और अमेरिकी दूतावास पर कब्जा कर 52 अमेरिकियों को बंधक बना लिया गया . यह घटना 444 दिनों तक चली और इसने दोनों देशों के बीच गहरी दरार पैदा कर दी.

2015 में ओबामा प्रशासन ने JCPOA समझौता किया था 

1980 के दशक में इराक-ईरान युद्ध के दौरान अमेरिका ने इराक का साथ दिया जिससे ईरान में अमेरिका विरोधी भावनाएं और मजबूत हुईं. 2000 के दशक में ईरान के परमाणु कार्यक्रम पर संदेह बढ़ा इस दौरान अमेरिका और उसके सहयोगी देशों का मानना था कि ईरान गुपचुप तरीके से परमाणु हथियार बना रहा है जबकि ईरान हमेशा ही इसे शांतिपूर्ण ऊर्जा कार्यक्रम बताता रहा. 2015 में ओबामा प्रशासन ने JCPOA (जॉइंट कॉम्प्रिहेंसिव प्लान ऑफ एक्शन) समझौता किया, जिसमें ईरान ने अपने परमाणु कार्यक्रम को सीमित करने का वादा किया और बदले में अमेरिका ने प्रतिबंध हटाए. लेकिन 2018 में ट्रंप ने इस समझौते से अमेरिका को बाहर कर लिया और ईरान पर नए प्रतिबंध लगा दिए. बाइडेन ने इसे बहाल करने की कोशिश की लेकिन कामयाबी नहीं मिली. अब ट्रंप की वापसी के साथ तनाव फिर चरम पर है.

दोनों देशों के बीच आज की मुख्य समस्याएं, क्या निकलेगा समाधान? 

दोनों देशों के बीच सबसे बड़ा विवाद परमाणु कार्यक्रम पर है. ईरान का यूरेनियम संवर्द्धन (एनरिचमेंट) बड़ा मुद्दा है. अमेरिका चाहता है कि ईरान इसे पूरी तरह रोक दे या सीमित करे क्योंकि इससे हथियार बनने का खतरा है. लेकिन ईरान कहता है कि यह उसका अधिकार है और प्रतिबंध हटाने के बदले ही रियायत देगा. दूसरा मुद्दा है आर्थिक प्रतिबंध, अमेरिका के प्रतिबंधों से ईरान की अर्थव्यवस्था चरमरा गई है. तेल निर्यात गिरा, मुद्रास्फीति बढ़ी, और जनता में असंतोष फैला. ईरान चाहता है कि ये प्रतिबंध हटें जबकि अमेरिका ईरान के बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय गतिविधियों पर रोक लगाना चाहता है.

आज की बैठक ने जागई उम्मीद की किरण, क्या सफल होगी बातचीत?

आज की मुलाकात ईरानी विदेश मंत्री अब्बास अराघची और अमेरिकी दूत स्टीव विटकॉफ के बीच हो रही है. यह बैठक मूल रूप से इस्तांबुल में होनी थी, लेकिन ईरान ने ओमान को चुना है क्योंकि ओमान तटस्थ मध्यस्थ की भूमिका निभाता रहा है. ईरान सिर्फ परमाणु और प्रतिबंधों पर बात करना चाहता है जबकि अमेरिका मिसाइल और प्रॉक्सी समूहों को भी शामिल करना चाहता है. इस बीच मिस्र, तुर्की और कतर ने एक फ्रेमवर्क सुझाया है जिसमें ईरान तीन साल तक यूरेनियम संवर्द्धन रोकने, स्टॉक ट्रांसफर करने और हथियार सप्लाई बंद करने पर विचार करे. बैठक के बाद यह तय होगा कि दोनों देशों के  रिश्तों में कोई बड़ा बदलाव आएगा या हालत पहले की तरह बने रहेंगे.
 

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