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Who Discover Greenland know its History (Photo: AI)
Explainer: दुनिया का सबसे बड़ा द्वीप ग्रीनलैंड (Greenland) भले ही बर्फ, ग्लेशियर और रणनीतिक राजनीति के लिए जाना जाता हो, लेकिन इसका इतिहास हजारों साल पुराना और कई सभ्यताओं से जुड़ा हुआ है. अक्सर सवाल उठता है कि ग्रीनलैंड की खोज किसने की थी और आखिर इसका नाम 'ग्रीनलैंड' क्यों पड़ा, जबकि यहां हर तरफ बर्फ ही बर्फ नजर आती है. इस तो व्हाइटलैंड होना चाहिए. इस सवाल का जवाब भी जानेंगे लेकिन इसके साथ ही जानेंगे ग्रीनलैंड की खोज किसने की, क्यों यह अब दुनिया में काफी अहम हो गया?
ग्रीनलैंड की सबसे शुरुआती बसाहट
इतिहासकारों के मुताबिक, ग्रीनलैंड में सबसे पहले इंसानों की मौजूदगी करीब 4,500 साल पहले दर्ज की जाती है. ये लोग उत्तरी अमेरिका की ओर से आए पैलियो-एस्किमो समुदाय के थे. बाद में इनुइट जनजातियां यहां बस गईं, जो अब भी ग्रीनलैंड की मूल आबादी मानी जाती हैं. ये लोग शिकार, मछली पकड़ने और कठोर जलवायु में जीवन जीने की कला में माहिर थे.
यूरोप की नजर में ग्रीनलैंड की खोज
यूरोपीय इतिहास में ग्रीनलैंड की खोज का श्रेय एरिक द रेड (Erik the Red) को दिया जाता है. एरिक द रेड एक नॉर्स (वाइकिंग) खोजकर्ता थे. इन्हें 10वीं सदी में आइसलैंड से निर्वासित कर दिया गया था. निर्वासन के बाद उन्होंने पश्चिम की ओर यात्रा की और साल 982 ईस्वी के आसपास ग्रीनलैंड पहुंचे.
एरिक द रेड ने दक्षिण-पश्चिमी ग्रीनलैंड में कुछ क्षेत्रों को बसाने की कोशिश की और लोगों को वहां बसने के लिए प्रेरित किया.
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कैसे 'ग्रीनलैंड' पड़ा नाम?
सबसे दिलचस्प सवाल यही है कि बर्फ से ढके इस द्वीप का नाम ग्रीनलैंड (हरी भूमि) क्यों रखा गया?
इतिहासकारों के अनुसार, एरिक द रेड ने जानबूझकर यह आकर्षक नाम रखा ताकि लोग इस नए इलाके में बसने के लिए उत्साहित हों. ग्रीनलैंड नाम एक तरह का मार्केटिंग स्ट्रैटेजी था. हालांकि उस समय दक्षिणी ग्रीनलैंड के कुछ हिस्सों में गर्मियों के दौरान घास और हरियाली जरूर दिखती थी.
वाइकिंग बस्तियां और उनका पतन
एरिक द रेड के बाद कई वाइकिंग परिवार ग्रीनलैंड पहुंचे और यहां ईस्टर्न सेटलमेंट और वेस्टर्न सेटलमेंट नाम की बस्तियां बसाईं. ये बस्तियां लगभग 400-500 साल तक आबाद रहीं. लेकिन 15वीं सदी के आसपास जलवायु में बदलाव, ठंड बढ़ने, व्यापार में गिरावट और संसाधनों की कमी के कारण वाइकिंग बस्तियां धीरे-धीरे खत्म हो गईं.
डेनमार्क से जुड़ाव
18वीं सदी में डेनमार्क-नॉर्वे ने दोबारा ग्रीनलैंड पर अपना प्रभाव बढ़ाया. 1721 में डेनिश मिशनरी हांस एगेडे यहां पहुंचे और ईसाई मिशन की शुरुआत की. इसके बाद ग्रीनलैंड औपचारिक रूप से डेनमार्क के नियंत्रण में आ गया.
1953 में ग्रीनलैंड को डेनमार्क का आधिकारिक हिस्सा बना दिया गया और बाद में इसे स्वशासन (Self-Government) का दर्जा मिला. आज भी ग्रीनलैंड डेनमार्क के अधीन है, लेकिन आंतरिक मामलों में उसे व्यापक स्वायत्तता प्राप्त है.
आधुनिक दौर में ग्रीनलैंड का महत्व
ग्रीनलैंड सिर्फ ऐतिहासिक नहीं, बल्कि रणनीतिक, भू-राजनीतिक और पर्यावरणीय दृष्टि से बेहद अहम है. जलवायु परिवर्तन, दुर्लभ खनिज संसाधन और आर्कटिक क्षेत्र में इसकी स्थिति के कारण यह अमेरिका, यूरोप और चीन जैसी शक्तियों के लिए खास दिलचस्पी का केंद्र बन चुका है.
ये बातें भी ग्रीनलैंड को बनाती हैं खास
- ग्रीनलैंड रणनीतिक रूप से बेहद महत्वपूर्ण
- यह आर्कटिक क्षेत्र में स्थित है
- यहां दुर्लभ खनिज, तेल और गैस के भंडार हैं
- अमेरिका का थुले एयर बेस यहीं स्थित है
- जलवायु परिवर्तन के कारण यहां की बर्फ तेजी से पिघल रही है, जिससे नए समुद्री रास्ते खुल सकते हैं
इसी वजह से अमेरिका, रूस और चीन जैसे देश ग्रीनलैंड में बढ़ती दिलचस्पी दिखा रहे हैं.
कुलमिलाकर अगर कहा जा तो ग्रीनलैंड की खोज सिर्फ एक व्यक्ति या एक दौर की कहानी नहीं है. यह कहानी है आदिवासी सभ्यताओं, वाइकिंग खोजकर्ताओं और आधुनिक वैश्विक राजनीति के संगम की. एरिक द रेड ने भले ही इसे यूरोप की नजरों में लाया हो, लेकिन ग्रीनलैंड की आत्मा अब भी उसकी मूल इनुइट संस्कृति में बसती है.
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