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Photo - AI
Explainer: अमेरिका और ईरान के बीच तनाव कोई नया विषय नहीं है, लेकिन जब भी यह संघर्ष तेज होता है, उसका असर सिर्फ पश्चिम एशिया तक सीमित नहीं रहता. भारत जैसे देशों पर भी इसके राजनीतिक, आर्थिक और रणनीतिक प्रभाव पड़ते हैं. ऐसे में यह समझना जरूरी है कि अमेरिका-ईरान टकराव भारत को कैसे प्रभावित करता है और भारत के लिए ईरान, खासकर तेहरान, क्यों इतना महत्वपूर्ण है.
अमेरिका-ईरान संघर्ष की पृष्ठभूमि
1979 की इस्लामिक क्रांति के बाद से अमेरिका और ईरान के रिश्ते तनावपूर्ण रहे हैं. परमाणु कार्यक्रम, प्रतिबंध, क्षेत्रीय वर्चस्व और पश्चिम एशिया में ईरान की भूमिका इस टकराव के मुख्य कारण हैं. अमेरिका की ओर से लगाए गए आर्थिक प्रतिबंधों ने ईरान की अर्थव्यवस्था को कमजोर किया है, वहीं ईरान इन प्रतिबंधों को अपनी संप्रभुता पर हमला मानता है.
जब-जब यह संघर्ष बढ़ता है चाहे वह परमाणु समझौते से जुड़ा विवाद हो या सैन्य तनाव-उसका सीधा असर वैश्विक तेल बाजार, समुद्री व्यापार और क्षेत्रीय स्थिरता पर पड़ता है.
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भारत पर इसका सीधा असर कैसे पड़ता है?
1. तेल और ऊर्जा सुरक्षा
भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों का बड़ा हिस्सा आयात से पूरा करता है. ईरान कभी भारत के प्रमुख कच्चे तेल आपूर्तिकर्ताओं में शामिल था. अमेरिका के प्रतिबंधों के कारण भारत को ईरान से तेल आयात बंद या सीमित करना पड़ा.
जब भी खाड़ी क्षेत्र में तनाव बढ़ता है, कच्चे तेल की कीमतें बढ़ती हैं, जिससे भारत में महंगाई, चालू खाता घाटा और रुपये पर दबाव पड़ता है.
2. भारतीय प्रवासी और रेमिटेंस
पश्चिम एशिया में लाखों भारतीय काम करते हैं. अमेरिका–ईरान संघर्ष बढ़ने की स्थिति में क्षेत्रीय अस्थिरता, युद्ध या सुरक्षा संकट का खतरा पैदा होता है, जिसका असर भारतीय नागरिकों की सुरक्षा और भारत को मिलने वाले रेमिटेंस पर पड़ सकता है.
3. समुद्री व्यापार और सप्लाई चेन
हॉर्मुज जलडमरूमध्य से दुनिया का बड़ा हिस्सा तेल और गैस गुजरता है. किसी भी सैन्य तनाव से समुद्री रास्तों में बाधा आ सकती है. भारत का बड़ा व्यापार इन मार्गों पर निर्भर है, इसलिए सप्लाई चेन प्रभावित हो सकती है.
भारत के लिए क्यों अहम है तेहरान?
1. रणनीतिक साझेदार और संतुलन नीति
ईरान भारत की 'रणनीतिक स्वायत्तता' की नीति का अहम हिस्सा है. भारत एक तरफ अमेरिका के साथ मजबूत संबंध रखता है, तो दूसरी तरफ ईरान जैसे देशों से भी संपर्क बनाए रखता है ताकि क्षेत्रीय संतुलन बना रहे.
2. चाबहार पोर्ट और मध्य एशिया तक पहुंच
ईरान का चाबहार बंदरगाह भारत के लिए बेहद अहम है. इसके जरिए भारत अफगानिस्तान और मध्य एशिया तक पहुंच बना सकता है, बिना पाकिस्तान पर निर्भर हुए. यह भारत के व्यापार, कनेक्टिविटी और भू-राजनीतिक हितों के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है.
3. अफगानिस्तान और क्षेत्रीय स्थिरता
अफगानिस्तान में शांति और स्थिरता भारत और ईरान-दोनों के हित में है. ईरान इस क्षेत्र में प्रभावशाली भूमिका निभाता है. तेहरान के साथ संवाद भारत को क्षेत्रीय घटनाक्रम पर अपनी बात रखने का अवसर देता है.
4. सांस्कृतिक और ऐतिहासिक संबंध
भारत और ईरान के बीच सभ्यतागत संबंध सदियों पुराने हैं. भाषा, संस्कृति और व्यापार ने दोनों देशों को जोड़े रखा है, जो कूटनीतिक रिश्तों को भी मजबूती देता है.
भारत की रणनीति क्या है?
भारत अमेरिका-ईरान संघर्ष में खुलकर किसी एक पक्ष का समर्थन करने से बचता है. भारत का जोर संवाद, कूटनीति और क्षेत्रीय शांति पर रहता है. नई दिल्ली अपने राष्ट्रीय हितों-ऊर्जा सुरक्षा, प्रवासी भारतीयों की सुरक्षा और व्यापार-को प्राथमिकता देती है.
अमेरिका-ईरान संघर्ष भारत के लिए एक संवेदनशील भू-राजनीतिक चुनौती मानी जा सकती है. हालांकि भारत ने बीते कुछ वर्षों में खुद को आर्थिक रूप से काफी मजबूत किया है. ऐसे में इस तरह की चुनौतियों ने निपटने में भी भारत काफी हद तक सक्षम हो चुका है.
लेकिन युद्ध एक ऐसा मोर्चा जिसको लेकर कुछ कहा नहीं जा सकता है. ईरान-अमेरिका में जंग होती है तो इससे भारत की अर्थव्यवस्था, ऊर्जा सुरक्षा और क्षेत्रीय हित प्रभावित हो सकते हैं. वहीं, तेहरान भारत के लिए सिर्फ एक देश नहीं, बल्कि मध्य एशिया तक पहुंच, रणनीतिक संतुलन और क्षेत्रीय स्थिरता की एक अहम कड़ी है. यही वजह है कि भारत सावधानी से कदम रखते हुए दोनों पक्षों के साथ संवाद बनाए रखने की कोशिश करता है.
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