/newsnation/media/media_files/2026/02/10/how-much-speaker-have-no-confidence-motion-2026-02-10-15-14-14.jpg)
Explainer: संसद के शीतकालीन सत्र के दौरान सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच टकराव अब निर्णायक मोड़ पर पहुंचता दिख रहा है. कांग्रेस ने लोकसभा स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ आक्रामक कदम उठाते हुए उन्हें पद से हटाने के लिए अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस लोकसभा महासचिव को सौंप दिया है. इस घटनाक्रम ने न केवल सदन की कार्यवाही को प्रभावित किया है, बल्कि भारतीय संसदीय इतिहास के कुछ पुराने अध्यायों को भी फिर से चर्चा में ला दिया है. आइए जानते हैं कि ओम बिरला से पहले किनती बार स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव आ चुका है और इसके बाद क्या हुआ है. क्या स्पीकर की कुर्सी चली गई या फिर वह कुर्सी बचाने में कामयाब हुए?
नोटिस के बाद स्पीकर कार्यवाही से अलग
मुख्य विपक्षी दल कांग्रेस द्वारा नोटिस सौंपे जाने के बाद, संवैधानिक परंपरा के अनुसार ओम बिरला अब लोकसभा की कार्यवाही का संचालन नहीं कर सकेंगे. यही वजह है कि नोटिस के अगले दिन वे सदन की अध्यक्षता करते नजर नहीं आए. विपक्ष का आरोप है कि स्पीकर ने हालिया कार्यवाही के दौरान निष्पक्ष भूमिका नहीं निभाई और विपक्षी नेताओं को बोलने से रोका गया.
आज़ादी के बाद चौथी बार आया प्रस्ताव
भारतीय संसदीय इतिहास में यह पहला मौका नहीं है जब किसी लोकसभा स्पीकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया गया हो. आजादी के बाद यह चौथी बार है जब इस तरह की प्रक्रिया शुरू की गई है. हालांकि अब तक कोई भी लोकसभा स्पीकर इस प्रक्रिया के जरिए पद से हटाया नहीं जा सका है.
1954: पहली बार स्पीकर के खिलाफ प्रस्ताव
पहली बार 15 दिसंबर 1954 को देश के पहले लोकसभा स्पीकर जी. वी. मावलनकर के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव लाया गया था. समाजवादी पार्टी के नेता विग्नेश्वर मिश्रा ने यह प्रस्ताव पेश किया था. हालांकि लोकसभा ने इसे अस्वीकार कर दिया और मावलनकर अपने पद पर बने रहे.
1966 और 1987: दो और कोशिशें
दूसरी बार 24 नवंबर 1966 को तत्कालीन स्पीकर सरदार हुकुम सिंह के खिलाफ समाजवादी नेता मधु लिमये ने प्रस्ताव लाया, लेकिन यह भी असफल रहा. तीसरी कोशिश 15 अप्रैल 1987 को हुई, जब सीपीएम सांसद सोमनाथ चटर्जी ने लोकसभा अध्यक्ष बलराम जाखड़ के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव पेश किया. उस समय भी विपक्ष बहुमत जुटाने में नाकाम रहा.
चौथी बार ओम बिरला के खिलाफ कदम
अब चौथी बार कांग्रेस ने स्पीकर ओम बिरला के खिलाफ अविश्वास प्रस्ताव का नोटिस दिया है. नोटिस सौंपे जाने के बाद कम से कम 14 दिन का समय अनिवार्य होता है, जिसके बाद ही प्रस्ताव को सदन की कार्यसूची में शामिल किया जा सकता है.
स्पीकर को हटाने की संवैधानिक प्रक्रिया
लोकसभा स्पीकर को हटाने की प्रक्रिया संविधान के अनुच्छेद 94 और लोकसभा के नियमों में स्पष्ट रूप से दर्ज है. कोई भी लोकसभा सदस्य लिखित रूप में महासचिव को नोटिस दे सकता है, जिसमें स्पीकर के खिलाफ स्पष्ट और ठोस आरोप दर्ज करना जरूरी होता है.
14 दिन बाद प्रस्ताव सदन में रखा जाता है, जहां कम से कम 50 सांसदों का समर्थन आवश्यक होता है. यदि यह समर्थन मिल जाता है, तो प्रस्ताव पर बहस और फिर मतदान होता है. सदन में बहुमत मिलने पर ही स्पीकर को पद से हटाया जा सकता है.
बहरहाल राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि भले ही इतिहास विपक्ष के पक्ष में नहीं रहा हो, लेकिन मौजूदा कदम संसद में बढ़ते अविश्वास और टकराव का बड़ा संकेत है. आने वाले दिनों में यह देखना अहम होगा कि क्या यह प्रस्ताव केवल राजनीतिक दबाव तक सीमित रहता है या संसदीय इतिहास में कोई नया मोड़ लेता है.
यह भी पढ़ें - लोकसभा स्पीकर के खिलाफ पेश हुआ अविश्वास प्रस्ताव, 190 सांसदों में राहुल गांधी का नाम नहीं, TMC ने भी बनाई दूरी
/newsnation/media/agency_attachments/logo-webp.webp)
Follow Us