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पाकिस्तान एक फिर कश्मीर में भेज सकता है भाड़े के तालिबानी आतंकी 

कट्टरपंथी इस्लामिक धड़े जिहाद के नाम पर कश्मीर घाटी में घुसपैठ करते हैं और कश्मीर की सुंदर वादियों में खूनी खेल खेलते हैं.

News Nation Bureau | Edited By : Pradeep Singh | Updated on: 26 Aug 2021, 02:21:54 PM
TALIBAN

तालिबान (Photo Credit: NEWS NATION)

highlights

  • पाकिस्तान हक्कानी नेटवर्क की मदद से अतीत में करा चुका है काबुल में भारतीय दूतावास पर हमला
  • तालिबान का उदय दुनिया भर में  बड़े पैमाने पर इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देगा
  • पाकिस्तान कश्मीर के मुद्दे पर आतंकवादियों को जिहाद के लिए करता है प्रेरित

नई दिल्ली:

अफगानिस्तान में तालिबान के कब्जा के बाद भारत में आंतरिक सुरक्षा को लेकर विभिन्न हलको में चिंता प्रकट की जा रही है. यह चिंता अकारण नहीं है. तालिबान के लड़ाके पहले भी कश्मीर के अंदर और सीमापार से आतंकी गतिविधि संचावित करते रहे हैं. यह सब जिहाद और इस्लाम के नाम पर किया जाता है.पाकिस्तान की राजनीति में कश्मीर अहम मुद्दा है. कोई भी राजनेता और सरकार इस मुद्दे को नजरंदाज नहीं कर सकते हैं. जनता को भ्रम में डालने और बुनियादी मुद्दों से ध्यान भटकाने के लिए भी पाक में कश्मीर का मुद्दा उछाला जाता है.पाकिस्तान में कोई भी सरकार आये वो 'कश्मीर को लेकर रहेंगे' का राग जरूर अलापता है. कश्मीर पर पाकिस्तान की इस नीति से भारत के सुरक्षा पर गंभीर खतरा रहता है. कट्टरपंथी इस्लामिक धड़े जिहाद के नाम पर कश्मीर घाटी में घुसपैठ करते हैं और कश्मीर की सुंदर वादियों में खूनी खेल खेलते हैं.

यह बिल्कुल साफ है कि पाकिस्तान जिहाद का अड्डा होने के साथ तालिबान के प्रति सॉफ्ट कॉर्नर रखता है. अब आईएसआई अफगानिस्तान में तालिबान के जिहाद नियंत्रण कक्ष में होगा और सुन्नी आतंकवादी समूह का उपयोग भारत में और अपने वैश्विक विरोधियों के खिलाफ करेगा.

जब मार्च 2008 में प्रतिबंधित स्टूडेंट्स इस्लामिक मूवमेंट ऑफ इंडिया (सिमी) के पूर्व अध्यक्ष सफदर नागोरी को इंदौर से गिरफ्तार किया गया, तो इस कट्टर इस्लामपंथी ने अपने पूछताछ में स्वीकार किया था कि वह तालिबान के तत्कालीन अमीर-उल-मोमीन मुल्ला उमर का सम्मान करता है और उसे इस्लामिक दुनिया का सच्चा खलीफा मानता है. 

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नागोरी ने अपने पूछताछकर्ताओं से कहा कि उसका उद्देश्य मुल्ला उमर के नेतृत्व में भारत में जिहाद छेड़ना था, जिसके बारे में कहा जाता है कि वह 2013 में ज़ाबुल में मर गया था. सिमी कट्टरपंथी ने कहा कि वह अल कायदा प्रमुख ओसामा बिन लादेन का बहुत सम्मान करता था, लेकिन उसे खलीफा नहीं मान सकता था क्योंकि उसे उसकी ही धरती या सऊदी अरब से उजाड़ दिया गया था. दूसरी ओर, मुल्ला उमर ने भी अपने ही देश और अपने क्षेत्र में जिहाद छेड़ा था. मुल्ला उमर और तालिबान की तरह, नागोरी एक देवबंदी है, जो इस्लाम की अति-रूढ़िवादी वहाबी शाखा से भी प्रेरणा लेती है. ओसामा बिन लादेन सलाफी इस्लाम के अनुयायी थे.

अब जबकि, सिमी का संगठन मौजूद नहीं है लेकिन उसके कई कैडर भारत में वहादत-ए-इस्लाम में स्थानांतरित हो गए हैं. भारतीय आतंकवाद विरोधी विशेषज्ञों का ऐसा ही मानना है. नागोरी की खाड़ी संपर्कों और मुल्ला उमर के साथ संबंध स्थापित करने के बावजूद  सिमी तालिबान प्रमुख तक नहीं पहुंच सका. यह भी ध्यान रखना महत्वपूर्ण है कि सिमी के कई कैडर इंडियन मुजाहिदीन में शामिल हो गए, जो लश्कर-ए-तैयबा द्वारा प्रशिक्षित और पाकिस्तान की इंटर-सर्विसेज इंटेलिजेंस (आईएसआई) द्वारा प्रचारित एक सलाफी आतंकवादी संगठन है. जैश-ए-मोहम्मद, भारत को निशाना बनाने वाला पाकिस्तान स्थित अन्य संगठन, हक्कानी नेटवर्क या तहरीक-ए-तालिबान पाकिस्तान (टीटीपी) जैसे देवबंदी कट्टरपंथियों का ही सहयोगी है. 

इस तथ्य को देखते हुए कि भारत में सुन्नी कट्टरपंथी वर्तमान में काबुल को नियंत्रित करने वाले सुन्नी पश्तून समूह से प्रेरणा लेते हैं, अफगानिस्तान में तालिबान का उदय, हैबातुल्लाह अखुंदजादा के नेतृत्व में, सभी जिहादियों को एक स्पष्ट संदेश भेजता है कि सच्चे इस्लाम को मानने से ही हम विजयी हुए हैं, और यही दार-उल-इस्लाम का एकमात्र रास्ता है.

भारतीय दृष्टिकोण से देंखे तो तालिबान का उदय न केवल बड़े पैमाने पर इस्लामिक कट्टरपंथ को बढ़ावा देगा बल्कि मोदी सरकार के लिए आंतरिक सुरक्षा चुनौती भी पेश करेगा. यह भारत पर हमला करने के लिए पाकिस्तान स्थित आतंकवादी समूहों को भी प्रोत्साहित करेगा. भले ही देवबंदी और सलाफी अलग-अलग स्कूल हैं, लेकिन आतंकी संगठनों के साथ गहरे जुड़ा पाकिस्तानी राज्य देवबंदी हक्कानी नेटवर्क की मदद से अतीत में काबुल में भारतीय दूतावास पर हमला करने के लिए लश्कर-ए-तैयबा जैसे सलाफी समूहों का इस्तेमाल कर चुका है. 

जैश और लश्कर कैडर भारत के खिलाफ संयुक्त अभियान चलाने के लिए जाने जाते हैं, आईएसआई ने सुनिश्चित किया है कि उन्हें पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर (पीओके) में एक ही पैड से लॉन्च किया गया है. इसी तरह, जैश ने अफगानिस्तान में तालिबान के साथ काम किया है, लेकिन यह आईएसआई था जिसने हक्कानी नेटवर्क को पूर्व में जलालाबाद और कंधार में भारतीय दूतावास और वाणिज्य दूतावासों पर हमला करने के लिए लश्कर कैडर की मदद करने के लिए मजबूर किया था. अफगानिस्तान के कुनार प्रांत में लश्कर का अपने आप में सीमित प्रभाव है.

First Published : 26 Aug 2021, 02:21:54 PM

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