Holi 2026: राजस्थान की अनोखी होली, जहां जिंदा युवक की निकलती है रथ यात्रा, 400 साल से चली आ रही है यह परंपरा

Bhilwara Holi Tradition: राजस्थान के भीलवाड़ा में होली के बाद मनाई जाने वाली ‘मुर्दे की सवारी’ एक अनोखी परंपरा है, जो नकारात्मकता के अंत और नई शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है. चलिए जानते हैं कैसे निभाई जाती है यह अनोखी परंपरा.

Bhilwara Holi Tradition: राजस्थान के भीलवाड़ा में होली के बाद मनाई जाने वाली ‘मुर्दे की सवारी’ एक अनोखी परंपरा है, जो नकारात्मकता के अंत और नई शुरुआत का प्रतीक मानी जाती है. चलिए जानते हैं कैसे निभाई जाती है यह अनोखी परंपरा.

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Akansha Thakur
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Bhilwara Holi Tradition

Bhilwara Holi Tradition

Bhilwara Holi Tradition: राजस्थान में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं है. यहां हर इलाके की अपनी अलग परंपरा है. इन्हीं परंपराओं में एक बेहद रस्म भीलवाड़ा में देखने को मिलती है. होली के बाद यहां एक जिंदा युवक की शव यात्रा निकाली जाती है. उसे कफन पहनाया जाता है और अंतिम संस्कार तक की तैयारी की जाती है. हालांकि यह कोई शोक नहीं, बल्कि आस्था और उत्सव से जुड़ी परंपरा है. चलिए जानते हैं कैसे निभाई जाती है यह अनोखी परंपरा. 

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400 साल पुरानी परंपरा की कहानी

भीलवाड़ा में इस अनोखे आयोजन को इला जी का डोल या मुर्दे की सवारी कहा जाता है. स्थानीय मान्यताओं के अनुसार, यह परंपरा लगभग 400 साल पुरानी है. यह आयोजन होली के सात दिन बाद, यानी शीतला सप्तमी के दिन किया जाता है. लोगों का मानना है कि यह रस्म बुराई और नकारात्मकता को विदा करती है. इसके साथ ही जीवन में नई ऊर्जा और सकारात्मक शुरुआत का संदेश देती है.

कैसे निभाई जाती है यह अनोखी परंपरा? 

परंपरा के अनुसार, चित्तौड़ वालों की हवेली से एक युवक को चुना जाता है. युवक को कफन ओढ़ाकर अर्थी पर लिटाया जाता है. इसके बाद ढोल-नगाड़ों और गाजे-बाजे के साथ उसकी शव यात्रा निकाली जाती है. युवक पूरी यात्रा के दौरान शांत रहता है. रास्ते में लोग गुलाल उड़ाते हैं. नाचते-गाते जुलूस में शामिल होते हैं. यहां माहौल शोक का नहीं, बल्कि उत्सव जैसा होता है.

श्मशान में होता है सबसे चौंकाने वाला दृश्य

इस परंपरा का सबसे रोमांचक पल श्मशान घाट पर आता है. अंतिम संस्कार से ठीक पहले अर्थी पर लेटा युवक अचानक उठकर भाग जाता है. इसके बाद उसकी जगह घास-फूस से बना पुतला रखा जाता है. फिर उसी पुतले का विधिवत अंतिम संस्कार किया जाता है. इस नजारे को देखने के लिए दूर-दूर से लोग पहुंचते हैं.

क्या है मुर्दे की सवारी का संदेश? 

भीलवाड़ा की यह परंपरा केवल एक धार्मिक रस्म नहीं है. इसके पीछे जीवन का गहरा संदेश छिपा है. यह बताती है कि बुराइयों और नकारात्मक सोच का अंत जरूरी है. पुराने दुखों को छोड़कर आगे बढ़ना ही जीवन है. शीतला सप्तमी के दिन पूरे शहर में मेले जैसा माहौल रहता है. स्थानीय लोगों के साथ-साथ अन्य राज्यों से भी पर्यटक आते हैं. इला जी का डोल आज भी यही सिखाता है कि हर अंत के बाद एक नई शुरुआत होती है.

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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. न्यूज नेशन इसकी पुष्टि नहीं करता है. 

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