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Premanand Ji Maharaj
Paremanand Ji Maraj: वृंदावन के रसिक संत श्री हित प्रेमानंद गोविंद शरण जी महाराज अपने प्रवचनों में बार-बार इस बात पर जोर देते हैं कि मनुष्य को बांधने वाली सबसे बड़ी शक्ति उसकी इच्छाएं होती हैं. यही कामनाएं इंसान को जन्म और मृत्यु के अंतहीन चक्र में उलझाए रखती हैं. महाराज जी का मानना है कि जब तक इच्छाओं का शासन मन पर रहता है, तब तक सच्ची शांति संभव नहीं.
इच्छा ही बंधन की जड़
महाराज जी कहते हैं कि जैसे ही मन में किसी वस्तु, व्यक्ति या स्थिति को पाने की चाह पैदा होती है, उसी क्षण मन स्वतंत्र नहीं रह जाता. इच्छा हमें परतंत्र बना देती है. हम उसी के अनुसार सोचने, निर्णय लेने और कर्म करने लगते हैं. यही मानसिक गुलामी आगे चलकर संसारिक बंधन का रूप ले लेती है.
अशांति कैसे जन्म लेती है?
प्रेमानंद जी महाराज के अनुसार, इच्छा पूरी न हो तो मन में क्रोध पैदा होता है. यदि इच्छा पूरी हो जाए तो लोभ बढ़ता है. इन दोनों स्थितियों में मन अशांत ही रहता है. संत प्रेमानंद जी कहते हैं कि यही कारण है कि भौतिक सुख मिलने के बाद भी मनुष्य संतुष्ट नहीं हो पाता. उसे कुछ और चाहिए होता है.
महाराज जी का समाधान बेहद स्पष्ट और व्यावहारिक है. वे कहते हैं कि इच्छाओं को दबाने से नहीं, बल्कि उन्हें सही दिशा देने से मुक्ति मिलती है. सभी सांसारिक इच्छाओं को एक ही इच्छा में बदल देना चाहिए भगवान की प्राप्ति की इच्छा. जब लक्ष्य बदलता है, तो मन का स्वभाव भी बदलने लगता है.
‘मुझे चाहिए’ से ‘मुझे प्रभु चाहिए’ तक
जब मन “मुझे यह चाहिए” के भाव से ऊपर उठकर “मुझे प्रभु चाहिए” की अवस्था में पहुंचता है, तभी वास्तविक आनंद का अनुभव होता है. इस स्थिति में व्यक्ति बाहरी परिस्थितियों से प्रभावित नहीं होता. सुख-दुख, लाभ-हानि उसे विचलित नहीं कर पाते.
नाम जप और मन पर कैसे करें कंट्रोल?
महाराज जी नाम जप को मन को साधने का सबसे प्रभावी साधन मानते हैं. नियमित रूप से भगवान के नाम का स्मरण करने से चित्त धीरे-धीरे स्थिर होता है. विचारों की गति कम होती है और इच्छाओं का प्रभाव कमजोर पड़ने लगता है. यही अभ्यास अंततः भक्ति को गहरा करता है.
प्रेमानंद जी महाराज का दर्शन हमें सिखाता है कि समस्या संसार में नहीं, हमारी इच्छाओं में है. जब इच्छाएं सीमित होती हैं, तो दुख बढ़ता है. जब वही इच्छाएं भक्ति में परिवर्तित हो जाती हैं, तो जीवन सरल और शांत हो जाता है.
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