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Bhishma Ashtami 2026 Katha
Bhishma Ashtami Vrat Katha: हर साल माघ महीने के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि को भीष्म अष्टमी मनाई जाती है. यह दिन महाभारत काल के महान योद्धा और धर्मपरायण पितामह भीष्म की स्मृति से जुड़ा है. मान्यता है कि इसी तिथि को उन्होंने अपने प्राण त्यागे थे. इसलिए इसे उनकी पुण्य तिथि माना जाता है. सनातन परंपरा में इस दिन को शुभ माना गया है. लोग पितरों की शांति के लिए तर्पण करते हैं. कई श्रद्धालु संतान सुख की कामना से व्रत भी रखते हैं. माना जाता है कि भीष्म पितामह के आशीर्वाद से दंपत्तियों को सद्गुणी संतान का वरदान मिलता है.
व्रत और पूजा की परंपरा
भीष्म अष्टमी के दिन प्रातः स्नान के बाद व्रत का संकल्प लिया जाता है. पितरों का स्मरण कर जल और तिल से तर्पण किया जाता है. पूजा के समय व्रत कथा का पाठ करना जरूरी माना गया है. इसके बाद भगवान विष्णु और पितामह भीष्म की आराधना की जाती है.
पितामह भीष्म की व्रत कथा
पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, पितामह भीष्म का जन्म महाराज शांतनु और मां गंगा के घर हुआ था. उनका मूल नाम देवव्रत था. उनका पालन-पोषण माता गंगा ने किया. बाद में उन्होंने महर्षि परशुराम से शस्त्र विद्या सीखी. गुरु बृहस्पति से राजनीति और धर्म का ज्ञान पाया. जब देवव्रत युवावस्था में पहुंचे तब उन्हें हस्तिनापुर का राजकुमार घोषित किया गया. इसी समय राजा शांतनु सत्यवती से विवाह करना चाहते थे. सत्यवती के पिता ने शर्त रखी कि उनकी बेटी का पुत्र ही राजा बनेगा.
भीष्म प्रतिज्ञा का संकल्प
पिता की खुशी के लिए देवव्रत ने अपना अधिकार छोड़ दिया. उन्होंने जीवन भर ब्रह्मचारी रहने की कठोर प्रतिज्ञा ली. इसी महान त्याग के कारण उन्हें भीष्म कहा जाने लगा. यह व्रत आज भी “भीष्म प्रतिज्ञा” के नाम से जाना जाता है. इस त्याग से प्रसन्न होकर राजा शांतनु ने उन्हें इच्छा मृत्यु का वरदान दिया. इसका अर्थ था कि भीष्म अपनी इच्छा से ही इस संसार को छोड़ेंगे.
महाभारत युद्ध और बाणों की शय्या
महाभारत के युद्ध में भीष्म कौरवों के सेनापति बने. उन्होंने दस दिनों तक युद्ध का नेतृत्व किया. अर्जुन ने शिखंडी को आगे कर उन पर बाण चलाए. नारी के रूप में शिखंडी को देखकर भीष्म ने शस्त्र नहीं उठाए. बाणों से घायल होकर भीष्म धरती पर गिर पड़े. उस समय सूर्य दक्षिणायन में थे. इसलिए उन्होंने प्राण त्याग नहीं किए. वे कई दिनों तक बाणों की शय्या पर लेटे रहे. उत्तरायण आने के बाद माघ शुक्ल अष्टमी को उन्होंने देह त्याग किया. आज श्रद्धालु इस दिन पितरों की शांति और परिवार की सुख-समृद्धि के लिए पूजा करते हैं. माना जाता है कि सच्चे मन से किया गया व्रत जीवन में सकारात्मक बदलाव लाता है.
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Disclaimer: इस खबर में दी गई जानकारी धार्मिक मान्यताओं और सामान्य जानकारियों पर आधारित है. न्यूज नेशन इसकी पुष्टी नहीं करता है.
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