'पजामे का नाड़ा खींचना रेप की कोशिश', सुप्रीम कोर्ट ने बदला इलाहबाद हाई कोर्ट का फैसला, जानें और क्या कहा?

देश की सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित आदेश को पलटते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी नाबालिग के साथ ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलने की कोशिश करना 'बलात्कार की कोशिश' की श्रेणी में आ सकता है.

देश की सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित आदेश को पलटते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी नाबालिग के साथ ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलने की कोशिश करना 'बलात्कार की कोशिश' की श्रेणी में आ सकता है.

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Dheeraj Sharma
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भोजपुर मामले पर सुप्रीम कोर्ट की अहम टिप्पणी Photograph: (Social Media)

देश की सर्वोच्च अदालत ने इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक विवादित आदेश को पलटते हुए स्पष्ट कर दिया है कि किसी नाबालिग के साथ ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का नाड़ा खोलने की कोशिश करना 'बलात्कार की कोशिश' की श्रेणी में आ सकता है. इस फैसले के साथ ही सुप्रीम कोर्ट ने हाई कोर्ट की कानूनी व्याख्या पर कड़ी टिप्पणी भी की है.

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बेंच की सख्त टिप्पणी

मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत की अगुवाई वाली पीठ, जिसमें न्यायमूर्ति जोएमाल्या बागची और एनवीअंजारिया शामिल थे, ने कहा कि यौन अपराधों से जुड़े मामलों में केवल तकनीकी कानूनी तर्क ही नहीं, बल्कि संवेदनशीलता और सहानुभूति भी आवश्यक है. अदालत ने कहा कि आपराधिक न्यायशास्त्र के स्थापित सिद्धांतों का गलत इस्तेमाल किया गया था, जिसके चलते हाई कोर्ट का आदेश रद्द किया जा रहा है.

क्या था हाई कोर्ट का फैसला?

17 मार्च 2025 को इलाहाबाद हाई कोर्ट ने कहा था कि केवल ब्रेस्ट पकड़ना और पायजामे का डोरा खींचना 'बलात्कार' या 'बलात्कार की कोशिश' नहीं है, बल्कि यह रेप की तैयारी या महिला के साथ आपराधिक बल प्रयोग के दायरे में आ सकता है. यह आदेश न्यायमूर्ति राम मनोहर नारायण मिश्रा ने दो आरोपियों की पुनरीक्षण याचिका पर सुनाया था. आरोपियों ने कासगंज की विशेष अदालत की ओर से भारतीय दंड संहिता की धारा 376 सहित अन्य धाराओं में जारी समन को चुनौती दी थी. 

सुप्रीम कोर्ट का स्पष्ट रुख

सुप्रीम कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि जिन तथ्यों का उल्लेख किया गया है, वे प्रथम दृष्टया बलात्कार की कोशिश का मामला बनाते हैं. अदालत ने कहा कि किसी नाबालिग को पकड़कर उसके कपड़े उतारने की दिशा में की गई कोशिश को महज “तैयारी” नहीं कहा जा सकता.

साथ ही, अदालत ने यह भी स्पष्ट किया कि निचली अदालत द्वारा लगाए गए कड़े आरोपों को बहाल किया जाता है. शीर्ष अदालत ने यह आदेश स्वतः संज्ञान (सुओ मोटू) के तहत दिया, जब उसे हाई कोर्ट के फैसले की जानकारी मिली.

POCSO के तहत आरोप बहाल

अदालत ने प्रोटेक्शन ऑफ चिल्ड्रेन फ्रॉम सेक्सुअल ऑफेंसेज (POCSO) अधिनियम के तहत आरोपियों के खिलाफ “बलात्कार की कोशिश” से जुड़े गंभीर आरोपों को पुनः लागू करने का निर्देश दिया.

इस फैसले को बाल संरक्षण कानूनों की सख्त व्याख्या और पीड़ितों के अधिकारों की रक्षा के संदर्भ में अहम माना जा रहा है. सुप्रीम कोर्ट ने संकेत दिया है कि यौन अपराधों के मामलों में न्यायालयों को तथ्यों की संवेदनशीलता और अपराध की प्रकृति को ध्यान में रखते हुए निर्णय देना चाहिए.

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