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'हत्यारी' हवा से कैसे बचेगी दिल्ली ?

अक्टूबर का महीना और दिल्ली में टेंशन बढ़ी हुई है. फिर सांसों के संकट की आहट से सहमी हुई है दिल्ली. ठंड की दस्तक होते ही दिल्ली की एयर क्वालिटी पर ग्रहण लग जाता है

Satya Narayan | Edited By : Sunder Singh | Updated on: 13 Oct 2021, 08:35:07 PM
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the 'killer' wind (Photo Credit: ANI)

highlights

  • अक्टूबर आते ही बढ़ने लगती है दिल्ली के लोगों की टेंशन 
  • सांसों पर गहराने लगता है संकट
  •  ठंड की दस्तक के साथ ही दिल्ली होने लगती है धुआं-धुआं

नई दिल्ली :

अक्टूबर का महीना और दिल्ली में टेंशन बढ़ी हुई है. फिर सांसों के संकट की आहट से सहमी हुई है दिल्ली. ठंड की दस्तक होते ही दिल्ली की एयर क्वालिटी पर ग्रहण लग जाता है. बारिश के दौरान जो साफ हवा खुशनुमा एहसास करवाती है. दिल्ली में सर्दी आते आते ये दम घोंटने के लिए तैयार हो जाती है.. ठंड की दस्तक के साथ दिल्ली में धूल, धुआं और हवा का ऐसा जहरीला कॉकटेल बनता है..कि लोगों की सांसों पर संकट मंडराने लगता है.. एनर्जी एंड रिसोर्सेज इंस्टीट्यूट (TERI) की स्टडी से कुछ अहम खुलासे हुए हैं..

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 स्टडी में हुआ खुलासा 
इस स्टडी के मुताबिक राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में रहने वाले 75.4% बच्चे घुटन महसूस करते हैं. टेरी के  वैज्ञानिकों ने दिल्ली में 14-17 साल की उम्र के 413 बच्चों का हेल्थ सर्वे किया. इसमें पाया गया कि 75.4% ने सांस फूलने की शिकायत की, 24.2% ने आंखों में खुजली की शिकायत की, 22.3% ने नियमित रूप से छींकने या नाक बहने की शिकायत और 20.9% बच्चों ने सुबह खांसी की शिकायत बताई.. इससे दिल्ली में प्रदूषण का अंदाजा लगाया जा सकता है. दिल्ली में पॉल्यूशन की सबसे बड़ी वजह गाड़ियों से निकलने वाला धुआं है.

आखिर कौन है जिम्मेदार ?
दिल्ली में अगर पॉल्यूशन में वाहनों की भागीदारी की बात की जाए तो यहां दुपहिया वाहन 24 फीसदी प्रदूषण के लिए जिम्मेदार हैं. वहीं बस, ट्रक और कार की हिस्सेदारी 17 फीसदी है. दिल्ली में पॉल्यूशन की वजह को समझने के लिए पीएम 2.5 और पीएम 10 लेवल को भी समझना जरूरी है. पीएम यानि पर्टिकूलेट मैटर या कण प्रदूषण जो वातावरण में मौजूद ठोस कणों और तरल बूंदों का मिश्रण है.  हवा में मौजूद ये पार्टिकल इतने छोटे होते हैं कि इसको सिर्फ माइक्रोस्कोप का इस्तेमाल कर पता लगाया जा सकता है.. पार्टिकल पॉल्यूषन में PM 2.5 और PM 10  शामिल होते हैं जो बेहद खतरनाक होते हैं. दिल्ली में पीएम 2.5 और पीएम 10 के बढ़ने की वजहों के बारे में बात करें तो ट्रांसपोर्ट से निकलने वाले धुएं में PM-2.5 कणों की हिस्सेदारी 41 फीसदी है वहीं PM-10 18 फीसदी है.

सड़क पर उड़ने वाली धूल में PM-2.5  21 फीसदी है, वहीं PM-10  दस फीसदी है । फैक्ट्रियों से होने वाले पॉल्यूशन में PM 2.5 19 फीसदी है ।इसमे PM-10 15 फीसदी है ।सड़क पर उड़ने वाली धूल गाड़ियों और उद्योगों से निकलने वाला धुआं. इन सबसे अलावा ठंड के महीने में दिल्ली वालों को अगर सबसे ज्यादा टेंशन होती है तो वो है पराली जलाने को लेकर 10 अक्टूबर के आस पास दिल्ली में पराली जलने लगती है. ठंड के मौसम में दिल्ली में स्मॉग सबसे ज्यादा लोगों को परेशान करता है .
दिल्ली का एयर पॉल्यूशन और पडोसी राज्यों में जलने वाला पराली का धुआं स्मॉग की वजह बनता है.. 

स्लो पायजन की तरह है प्रदूषण
ऐसे जहर जिसकी वजह से लाशें बिछती हैं लेकिन एहसास किसी को नहीं होता. वायु प्रदूषण से दिल्ली में 2020 में 54000 लोगों की मौत हुई. यानि 2020 में दिल्ली में हर दस मिनट में एक मौत हुई.  आंकड़ों को और विस्तार से समझें तो 2020 में दिल्ली में हर दिन 148 लोगों की जान पॉल्यूशन से हुई. हैरानी की बात यह है कि ये मौत तब हुई जब दिल्ली में लॉकडाउन रहा सड़कें सुनसान रहीं फैक्ट्रियां बंद रहीं. इसके बावजूद दिल्ली में पॉल्यूशन ने मौत का अंबार लगा दिया.  दिल्ली में पॉल्यूशन सिर्फ दिल्ली का मसला नहीं है.. दिल्ली के पड़ोसी राज्य भी इसके लिए जिम्मेदार हैं.. जानकारों के मुताबिक लॉकडाउन के बावजूद दिल्ली में पॉल्यूशन लेवल के खतरनाक स्तर पर रहने की एक वजह दिल्ली से सटे इलाकों में औद्योगिक गतिविधियों का जारी रहना रहा है..

First Published : 13 Oct 2021, 08:35:07 PM

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