Naravane Book Row: पब्लिश होने से पहले किताब सार्वजनिक होने पर क्या है सजा का प्रावधान? क्या हर बुक पर लग सकती है रोक?

Naravane Book Row: पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज मुकुंद नरवणे की प्रस्तावित किताब इन दिनों राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गई है. किताब अभी आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है

Naravane Book Row: पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज मुकुंद नरवणे की प्रस्तावित किताब इन दिनों राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गई है. किताब अभी आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है

author-image
Dheeraj Sharma
New Update
Naravane Book

Naravane Book Row: पूर्व थल सेनाध्यक्ष जनरल (सेवानिवृत्त) मनोज मुकुंद नरवणे की प्रस्तावित किताब इन दिनों राजनीतिक और कानूनी बहस का केंद्र बन गई है. किताब अभी आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं हुई है, लेकिन उसके कुछ कथित अंश मीडिया और राजनीति के गलियारों में सामने आ चुके हैं. किताब के प्रकाशन अधिकार रखने वाले पेंग्विन रैंडम हाउस इंडिया ने साफ किया है कि किताब अभी छपी नहीं है और जो भी प्रतियां या अंश सामने आए हैं, वे कॉपीराइट उल्लंघन के दायरे में आते हैं.

Advertisment

संसद से सड़क तक उठा मुद्दा

इस विवाद को विपक्ष ने संसद के भीतर और बाहर जोर-शोर से उठाया है. लोकसभा में नेता प्रतिपक्ष राहुल गांधी लगातार कथित किताब को दिखाकर सरकार पर सवाल खड़े कर रहे हैं. समाजवादी पार्टी प्रमुख अखिलेश यादव सहित अन्य विपक्षी नेताओं ने भी इसे अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता और सच्चाई से जोड़कर देखा है. वहीं सरकार समर्थक पक्ष इसे राष्ट्रीय सुरक्षा से जुड़ा गंभीर मामला बता रहा है.

अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता, लेकिन सीमाओं के साथ

भारत में किताब, लेख या संस्मरण लिखना और प्रकाशित करना संविधान के तहत अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता का हिस्सा है, लेकिन यह अधिकार पूर्ण नहीं है. जब लेखक कोई वर्तमान या पूर्व सरकारी अधिकारी हो और सामग्री राष्ट्रीय सुरक्षा, सैन्य रणनीति या गोपनीय जानकारी से जुड़ी हो, तो कानून और सेवा नियम इस स्वतंत्रता पर रोक लगाते हैं.

ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट का खतरा

यदि किसी किताब या लेख में ऐसी जानकारी हो जो सेना की तैनाती, सैन्य रणनीति, खुफिया इनपुट या संवेदनशील सीमा विवाद से जुड़ी हो और वह पहले सार्वजनिक न की गई हो, तो उस पर ऑफिशियल सीक्रेट्स एक्ट, 1923 लागू हो सकता है. इस कानून के तहत दोष सिद्ध होने पर 3 साल से लेकर 14 साल तक की कैद, जुर्माना या दोनों हो सकते हैं. हालांकि, सजा तभी संभव है जब यह साबित हो जाए कि जानकारी गोपनीय थी और बिना अनुमति सार्वजनिक की गई.

कंटेंट लीक करने पर अलग सजा

किताब प्रकाशित होने से पहले उसके कंटेंट को लीक करना भी कानूनन अपराध है. कॉपीराइट अधिनियम, 1957 के तहत ऐसा करने पर 6 महीने से 3 साल तक की जेल और 50 हजार से 2 लाख रुपये तक जुर्माना हो सकता है. अगर किसी तीसरे व्यक्ति ने कंटेंट लीक किया है, तो लेखक या प्रकाशक सिविल कोर्ट में हर्जाने का मुकदमा भी दायर कर सकते हैं.

सेवा नियम भी बन सकते हैं मुश्किल

सेना, आईएएस, आईपीएस और अन्य उच्च पदों से सेवानिवृत्त अधिकारियों पर सेवा नियम रिटायरमेंट के बाद भी लागू रहते हैं. सेना के मामलों में रक्षा मंत्रालय की प्री-पब्लिकेशन क्लियरेंस जरूरी होती है. बिना अनुमति किताब छापने या उसके अंश साझा करने पर पेंशन से जुड़ी कार्रवाई, अनुशासनात्मक नोटिस या आधिकारिक चेतावनी दी जा सकती है.

सवाल वही, जवाब बाकी

नरवणे की किताब को लेकर अब बड़ा सवाल यही है कि जो अंश सामने आए हैं, वे गोपनीय थे या नहीं, और उन्हें किसने लीक किया. जब तक किताब आधिकारिक रूप से प्रकाशित नहीं होती, तब तक यह विवाद राजनीति, कानून और राष्ट्रीय सुरक्षा के बीच झूलता रहेगा.

यह भी पढ़ें - पूर्व आर्मी चीफ की किताब के पब्लिशर बोले- हमारी ओर से किताब का कोई भी हिस्सा सार्वजनिक नहीं हुआ, पुलिस दर्ज कर चुकी है FIR

INDIA
Advertisment