मजहर टोपी से मुन्ना बजरंगी तक गैंगस्टर के रियल से ज्यादा निक नेम का होता है दबदबा, जानें कैसे मिले नाम

अंडरवर्ल्ड में दबदबा बनाने के लिए रियल नेम से ज्यादा निक नेम का दबदबा होता है. निक नेम के जरिए ही अपराधी अंडरवर्ल्ड और बाहरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाता है.

अंडरवर्ल्ड में दबदबा बनाने के लिए रियल नेम से ज्यादा निक नेम का दबदबा होता है. निक नेम के जरिए ही अपराधी अंडरवर्ल्ड और बाहरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाता है.

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Dheeraj Sharma
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Gangster Name

दिल्ली पुलिस स्पेशल सेल ने हाल ही में एक बड़ी कार्रवाई करते हुए महफूज उर्फ ‘बॉबी कबूतर’ को गिरफ्तार किया. उसका नाम हाशिम बाबा और लॉरेंस बिश्नोई गैंग से जुड़ाव के कारण लंबे समय से चर्चा में था. पुलिस रिकॉर्ड में वह कई गंभीर मामलों में वांटेड बताया गया है. बरेली में फिल्म अभिनेत्री दिशा पाटनी के घर पर हुई फायरिंग मामले में भी उसका नाम सामने आया था. इसके अलावा मशहूर पंजाबी गायक सिद्धू मूसेवाला के घर की रेकी से जुड़े इनपुट भी जांच एजेंसियों के पास थे.

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उसकी गिरफ्तारी केवल एक आरोपी की पकड़ नहीं, बल्कि उस अंडरवर्ल्ड की परतें खोलती है. लेकिन क्या आपको पता है कि अंडरवर्ल्ड में दबदबा बनाने के लिए रियल नेम से ज्यादा निक नेम का दबदबा होता है. निक नेम के जरिए ही अपराधी अंडरवर्ल्ड और बाहरी दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाता है.  लेकिन बड़ा सवाल यह है कि आखिर ये नाम इन्हें मिलते कैसे हैं? आइए जानते हैं कुछ नामों के पीछे की कहानी. 

अपराध की दुनिया में भी ‘ब्रांडिंग’ का खेल

फील्ड कोई भी हो प्रोडक्ट तब ही बिकता है जब उसकी ब्रांडिंग अच्छी हो. यही फॉर्मूला अंडरवर्ल्ड में भी काम करता है.  महफूज नाम शायद आम लोगों को याद न रहे, लेकिन ‘बॉबी कबूतर’ सुनते ही एक अलग छवि बनती है. अपराध जगत में ऐसे उपनाम महज संयोग नहीं होते, बल्कि एक तरह की ब्रांडिंग होते हैं. ये नाम डर, रुतबा और पहचान का मिश्रण बन जाते हैं. कई बार पुलिस रिकॉर्ड और मीडिया रिपोर्ट में भी यही नाम स्थायी पहचान बन जाता है.

अक्सर ये उपनाम किसी खास आदत, शैली या शारीरिक विशेषता से जुड़ते हैं. जैसे तेजी से वारदात कर भागने वाले को ‘कबूतर’, हथियारों के शौकीन को ‘पिस्टल’ या किसी इलाके से जुड़े अपराधी को उसी क्षेत्र के नाम से पहचाना जाने लगता है.

डर और दबदबा: नाम ही पहचान

अपराध की दुनिया में नाम मनोवैज्ञानिक हथियार की तरह काम करता है. ‘डॉन’, ‘सुल्तान’, ‘भाई’ या ‘बाबा’ जैसे शब्द अपने आप में ताकत और खौफ का संकेत देते हैं. कई अपराधी खुद भी ऐसा नाम चुनते हैं ताकि असली पहचान छिपी रहे और नई पहचान ज्यादा खतरनाक लगे. अलग-अलग इलाकों में अलग नाम से सक्रिय रहना भी पुलिस से बचने की रणनीति का हिस्सा रहा है.

जब उपनाम बन गए हेडलाइन

भारत के अपराध इतिहास में कई ऐसे चेहरे रहे हैं जिनके असली नाम से ज्यादा उनके उपनाम मशहूर हुए. जैसे-

- प्रेम प्रकाश सिंह ‘मुन्ना बजरंगी’ के नाम से कुख्यात हुआ. हनुमान भक्त होने की वजह से उसके नाम के साथ बजरंगी जुड़ा. 

- हाजी मस्तान ने तस्करी की दुनिया में अपनी अलग पहचान बनाई. उसका असली नाम हरनाम सिंह था. हज यात्रा करने के चलते उसे ये हाजी मस्तान नाम मिला. 

- राजेंद्र निकालजे ‘छोटा राजन’ के नाम से अंतरराष्ट्रीय स्तर तक चर्चित रहा. वह बड़ा राजन के नीचे काम करता था इसलिए उसका नाम छोटा राजन पड़ा. 

- अरुण गवली को ‘डैडी’ कहा गया, जो इलाके में उसके प्रभाव को दर्शाता था. उसका प्रभाव इतना था कि लोग उसे परिवार के मुखिया के तौर पर देखते थे. इसलिए डैडी नाम मिला. 

- संदीप ‘काला जठेरी’ के नाम से गैंगवार का बड़ा चेहरा बना. संदीप को काला जेठरी उसके रंग और अपराध के चलते मिला. 

- जितेंद्र मान ‘गोगी’ और नीरज बवानिया ‘बवानिया’ जैसे नाम भी क्षेत्रीय पहचान से जुड़े रहे. हालांकि उसे गोगी नाम बचपन में ही मिल गया था. 

-वहीं संतोषी जैन को ‘लेडी डॉन’ के नाम से जाना गया, जिसने पुरुष-प्रधान अपराध जगत में अपनी अलग छवि बनाई. संतोषी ने खुद एक गैंग की कमान संभाली थी, इसलिए उसे लेडी डॉन कहा जाने लगा. 

-सतीश उर्फ सप्पू पिस्टल: सतीश को ये हथियारों के शौक की वजह से मिला.

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