बदल गई मणिपुर की सियासत, बीरेन सिंह की विदाई, खुद अपनी पसंद बताकर खेमचंद को सौंपी सीएम की कुर्सी

लगभग एक वर्ष के राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में BJP ने लोकप्रिय सरकार के गठन का रास्ता साफ कर दिया है. पूर्व मंत्री युमनाम खेमचंद सिंह को नया मुख्यमंत्री चुना गया है. यह फैसला लंबे राजनीतिक दबाव, आंतरिक असंतोष और संवैधानिक मजबूरियों के बाद आया.

लगभग एक वर्ष के राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में BJP ने लोकप्रिय सरकार के गठन का रास्ता साफ कर दिया है. पूर्व मंत्री युमनाम खेमचंद सिंह को नया मुख्यमंत्री चुना गया है. यह फैसला लंबे राजनीतिक दबाव, आंतरिक असंतोष और संवैधानिक मजबूरियों के बाद आया.

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Ravi Prashant
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मणिपुर पॉलिटिक्स Photograph: (ANI)

मणिपुर में करीब एक साल से चला आ रहा सस्पेंस अब खत्म हो गया है. दिल्ली में हुई बड़ी बैठकों के बाद बीजेपी ने राज्य में फिर से अपनी सरकार बनाने का रास्ता साफ कर दिया है. पूर्व मंत्री युमनाम खेमचंद सिंह सिंह को राज्य की कमान सौंपी जा रही है. दिलचस्प बात यह है कि उनके नाम का एलान खुद पूर्व सीएम एन बीरेन सिंह ने किया, जिनके खेमचंद धुर विरोधी माने जाते रहे हैं. खास बात यह है कि खुद पूर्व सीएम एन बीरेन सिंह ने दिल्ली में हुई मीटिंग के बाद खेमचंद के नाम का एलान किया.

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पूर्व सीएम बीरेन सिंह की कुर्सी कैसे गई?

मणिपुर में मई 2023 में मैतेई और कुकी समुदायों के बीच हिंसा भड़की थी. इसके बाद से ही हालात काफी खराब हो गए थे. घाटी में मैतेई और पहाड़ों में कुकी लोग बंट गए. धीरे-धीरे खुद बीजेपी के अंदर भी बीरेन सिंह के खिलाफ आवाजें उठने लगीं. 19 बीजेपी विधायकों ने पीएम मोदी को चिट्ठी लिखकर साफ कह दिया था कि बीरेन सिंह के रहते शांति बहाल होना मुश्किल है.

दबाव तब और बढ़ गया जब सहयोगी पार्टी NPP ने समर्थन वापस ले लिया. आखिरकार, फरवरी 2025 में जब विपक्षी दल कांग्रेस अविश्वास प्रस्ताव लाने की तैयारी में था, तो बीरेन सिंह ने इस्तीफा दे दिया और राज्य में राष्ट्रपति शासन लगा दिया गया.

विधायकों ने क्यों की 'अपनी सरकार' की मांग?

राष्ट्रपति शासन लगने के कुछ महीनों बाद ही विधायकों ने मांग शुरू कर दी कि राज्य में फिर से सरकार बनाई जाए. उनका कहना था कि पुलिस और सुरक्षा बल व्यवस्था तो संभाल सकते हैं, लेकिन लोगों का भरोसा जीतने के लिए नेताओं का जमीन पर होना जरूरी है.

विधायकों को यह डर भी था कि अगर वे चुप बैठे रहे, तो अगले चुनाव में जनता को क्या जवाब देंगे. इसी दबाव के चलते 21 विधायकों ने फिर से केंद्र सरकार को चिट्ठी लिखी और सरकार बनाने का दावा पेश किया.

केंद्र सरकार की हिचकिचाहट और फिर आया फैसला

शुरुआत में केंद्रीय सरकार उलझन में थी. उन्हें लग रहा था कि अभी हालात पूरी तरह काबू में नहीं हैं और नई सरकार आने से शांति की कोशिशें बिगड़ सकती हैं. लेकिन पिछले कुछ महीनों में हालात थोड़े सुधरे, पीएम मोदी ने भी मणिपुर का दौरा किया और बातचीत का रास्ता खुला.

दूसरा बड़ा कारण यह भी था कि नियम के मुताबिक राष्ट्रपति शासन को एक साल से ज्यादा खींचने के लिए कई कानूनी अड़चनें आती हैं. इसलिए, अब केंद्र ने तय किया कि राज्य की कमान फिर से स्थानीय नेताओं को सौंप दी जाए.

खेमचंद सिंह के सामने क्या हैं चुनौतियां?

नए मुख्यमंत्री के रूप में खेमचंद सिंह के पास कांटों भरा ताज होगा. उनके सामने आपस में लड़ रहे समुदायों के बीच फिर से भरोसा पैदा करना होगा. राहत शिविरों (Relief Camps) में रह रहे लोगों को उनके घर वापस भेजना. बंद पड़े रास्तों को खुलवाना ताकि सामान की आवाजाही सामान्य हो सके. अगले एक साल में होने वाले विधानसभा चुनावों के लिए पार्टी को तैयार करना.

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