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ममता बनर्जी (फाइल फोटो)
Mamata Banerjee Supreme Court argument: पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने आज (4 फरवरी 2026) को सुप्रीम कोर्ट में स्पेशल इंटेंसिव रिवीजन (SIR) मुद्दे पर दायर अपनी याचिका में खुद अपनी दलीलें रखीं. सवाल उठता है कि क्या किसी राज्य का सीएम या याचिकाकर्ता कब और कैसे अपनी पैरवी कर सकता है ? आइए आपको इस बारे में डिटेल मे बताते हैं.
वहीं, सुप्रीम कोर्ट में हुई सुनवाई की बात करें तो सीएम ने अपना पक्ष रखते हुए चुनाव आयोग (EC) को जमकर घेरा. सीएम ने आयोग को 'व्हाट्सएप कमीशन' बताते हुए कहा कि बंगाल को जानबूझकर निशाना बनाया जा रहा है. चीफ जस्टिस सुर्याकांत की अगुवाई वाली बेंच ने इस मामले की सुनवाई की. अदालत ने याचिका पर EC को नोटिस जारी कर जवाब मांगा है. अब मामले की अगली सुनवाई 9 फरवरी को होगी.
VIDEO | Delhi: TMC MP and advocate Kalyan Banerjee on Supreme Court hearing West Bengal CM Mamata Banerjee's plea on SIR, says, "Today, the writ petition filed by Mamata Banerjee was taken up for hearing and she argued her case. The honourable court observed that if required more… pic.twitter.com/4iS8N4sRk7
— Press Trust of India (@PTI_News) February 4, 2026
याचिकाकर्ता कब और कैसे कर सकता है खुद अपनी पैरवी?
यह पहला मौका है जब किसी राज्य की सीएम सुप्रीम कोर्ट में अपनी याचिका पर खुद दलीलें पेश करती नजर आईं. दरअसल, ममता बनर्जी खुद प्रशिक्षित वकील हैं. कानून के जानकारों के अनुसार भारतीय न्याय व्यवस्था में कोई भी व्यक्ति चाहे वह मुख्यमंत्री हो या साधारण नागरिक अपना केस खुद लड़ सकता है, लेकिन यह कोई स्वत: अधिकार नहीं है.
मामला व्यक्तिगत हो या याचिकाकर्ता कानूनी रूप से अपनी पैरवी करने में सक्षम हो
यह 'पार्टी इन पर्सन' (PIP) के तहत आता है जहां याचिकाकर्ता को कोर्ट की अनुमति लेनी पड़ती है. एडवोकेट्स एक्ट की धारा 32 के मुताबिक अदालत किसी भी व्यक्ति को अपनी अनुमति से पेश होने की इजाजत दे सकती है भले वह पेशेवर वकील हो या नहीं. लेकिन यह विशेष परिस्थितियों में होता है जैसे जब मामला व्यक्तिगत हो या याचिकाकर्ता कानूनी रूप से अपनी पैरवी करने में सक्षम हो.
कोर्ट देखता है क्या याचिकाकर्ता कोर्ट की मदद कर सकता है ?
अपनी पैरवी के लिए याचिकाकर्ता को कानून में तय एक पूरी प्रक्रिया तय करनी पड़ती है. जैसे खुद पैरवी के लिए वह याचिका के साथ अलग से आवेदन देगा. फिर जज यह देखते हैं कि क्या याचिकाकर्ता कोर्ट की मदद कर सकता है या मामला ठीक से संभाल सकता है. आमतौर पर सिविल या रिट याचिकाओं में कोर्ट ऐसी अनुमति दे देता है लेकिन क्रिमिनल केस में ऐसे कम ही उदाहरण देखने को मिलता हैं क्यों ऐसे मसलों में विशेषज्ञता की जरूरत होती है.
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