लिव-इन रिलेशनशिप पर इलाहाबाद हाईकोर्ट का बड़ा फैसला, महिला को मिलेगा भरण-पोषण का अधिकार

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे जोड़े के अलग होने पर गुजारा भत्ता देने को लेकर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि लिव इन रिलेशन में पति-पत्नी की तरह रह हैं तो अलग होने पर महिला को गुजारा भत्ता का अधिकार है.

इलाहाबाद हाइकोर्ट ने लिव इन रिलेशनशिप में रह रहे जोड़े के अलग होने पर गुजारा भत्ता देने को लेकर अहम फैसला सुनाया है. कोर्ट ने कहा कि लिव इन रिलेशन में पति-पत्नी की तरह रह हैं तो अलग होने पर महिला को गुजारा भत्ता का अधिकार है.

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Akansha Thakur
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Allahabad High Court

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Allahabad High Court: लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर इलाहाबाद हाईकोर्ट ने बड़ा फैसला सुनाया है. अदालत ने कहा है कि यदि कोई पुरुष और महिला लंबे समय तक पति-पत्नी की तरह साथ रह रहे हैं, तो अलगाव की स्थिति में महिला को भरण-पोषण का अधिकार मिलेगा. यह अधिकार दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 125 के तहत दिया जाएगा.

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हाईकोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि केवल विवाह का पंजीकरण ही किसी महिला को संरक्षण देने का आधार नहीं हो सकता. यदि दोनों पक्षों के बीच संबंध सामाजिक रूप से पति-पत्नी जैसे रहे हैं, तो कानून महिला को असहाय स्थिति में नहीं छोड़ सकता. अदालत का मानना है कि ऐसे रिश्तों में महिला अक्सर आर्थिक रूप से निर्भर हो जाती है.

कोर्ट ने क्या कहा? 

अदालत ने स्पष्ट किया कि धारा 125 का उद्देश्य केवल कानूनी पत्नी तक सीमित नहीं है. इसका मकसद उन महिलाओं को भी संरक्षण देना है, जो लंबे समय तक एक रिश्ते में रहने के बाद अलगाव का सामना करती हैं. यदि यह साबित हो जाए कि दोनों साथ रह रहे थे और समाज में उन्हें पति-पत्नी के रूप में देखा जाता था, तो महिला भरण-पोषण की हकदार होगी.

फैसले का महत्व

यह फैसला उन महिलाओं के लिए राहत लेकर आया है, जो लिव-इन रिलेशनशिप में रहते हुए अपने करियर और जीवन के महत्वपूर्ण वर्ष एक रिश्ते को देती हैं. अलग होने पर अक्सर उन्हें आर्थिक और सामाजिक परेशानियों का सामना करना पड़ता है. हाईकोर्ट का यह निर्णय ऐसे मामलों में कानूनी सुरक्षा प्रदान करेगा.

पुरुषों के लिए भी संदेश

कोर्ट ने यह भी संकेत दिया कि लिव-इन रिलेशनशिप कोई अस्थायी या गैर-जिम्मेदार रिश्ता नहीं है. यदि कोई पुरुष लंबे समय तक किसी महिला के साथ पति की तरह रह रहा है, तो उस पर जिम्मेदारियां भी होंगी. अलगाव की स्थिति में वह जिम्मेदारियों से बच नहीं सकता.

क्यों लिया गया यह फैसला? 

इस फैसले से लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर समाज में चल रही भ्रम की स्थिति काफी हद तक साफ होगी. यह निर्णय महिलाओं के अधिकारों को मजबूत करता है और उन्हें कानूनी भरोसा देता है.

कुल मिलाकर, इलाहाबाद हाईकोर्ट का यह फैसला बदलते सामाजिक रिश्तों के अनुरूप कानून की व्याख्या करता है. साथ ही यह सुनिश्चित करता है कि कोई भी महिला रिश्ते के टूटने के बाद असहाय न रहे.

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