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R Madhavan
R Madhavan on Dhurandhar: आदित्य धर के निर्देशन में बनी स्पाई-एक्शन फिल्म ‘धुरंधर’ ने बॉक्स ऑफिस पर इतिहास रच दिया है. फिल्म ने 43 दिनों में वर्ल्डवाइड 1275.25 करोड़ रुपये की जबरदस्त कमाई कर ली है. इसके साथ ही यह हाल के वर्षों की सबसे ज्यादा चर्चा में रहने वाली हिंदी फिल्मों में शामिल हो गई है.
फिल्म को जहां एक वर्ग भारतीय सिनेमा के लिए गेम-चेंजर बता रहा है, तो वहीं कुछ लोग इसके राजनीतिक दृष्टिकोण पर सवाल भी उठा रहे हैं. ‘धुरंधर’ में आर. माधवन ने भारत के राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल से प्रेरित किरदार निभाया है. इसी बीच हाल ही में एक खास बातचीत में माधवन ने फिल्म की सफलता, उठे विवाद, अपने करियर और 55 साल की उम्र में बदलती सोच पर खुलकर बात की. तो चलिए आपको बताते हैं उन्होंने क्या-क्या कहा?
‘मुझे पता था कि धुरंधर गेम-चेंजर होगी’
आर. माधवन कहते हैं कि उन्हें फिल्म की सफलता का अंदाजा पहले से था, लेकिन इतना बड़ा विवाद खड़ा होगा, यह नहीं सोचा था. एक्टर ने कहा, “जब मैंने कहानी सुनी थी, तभी समझ गया था कि यह फिल्म गेम-चेंजर साबित होगी. मुझे लगा था कि फिल्म के सामाजिक पहलुओं पर चर्चा होगी कि भारत किस दिशा में जा रहा है.”
'हमें भी बड़ा सोचना होगा’
हॉलीवुड से तुलना करते हुए माधवन कहते हैं, “अमेरिका अपनी फिल्मों के जरिए यह यकीन दिलाता है कि दुनिया में कहीं भी कोई समस्या हो, उसका हल उन्हीं के पास है. चाहे एलियन अटैक हो या वैश्विक संकट, अमेरिकी फिल्मों में उनके लोग ताकतवर, बुद्धिमान और वैज्ञानिक रूप से उन्नत दिखाए जाते हैं. इसी वजह से हॉलीवुड एक मजबूत सॉफ्ट पावर बन पाया है.” वह आगे जोड़ते हैं, “भारत में भी ये सारी खूबियां हैं, लेकिन हमारी कहानियां अक्सर छोटे शहरों और सीमित सोच तक सिमट जाती हैं. ‘धुरंधर’ दिखाती है कि हालात बेहद मुश्किल हों, तब भारतीय क्या कर सकते हैं. फिल्म में सब कुछ असली लगता है.”
‘मतभेद स्वाभाविक हैं, लेकिन देश से ऊपर कुछ नहीं’
फिल्म पर उठे राजनीतिक सवालों पर माधवन साफ शब्दों में कहते हैं, “फिल्म की शुरुआत में ही साफ लिखा है कि यह असली घटनाओं से प्रेरित एक काल्पनिक कहानी है. हमारे देश में बम धमाके हुए हैं, कंधार अपहरण हुआ है, 26/11 जैसी घटनाएं हुई हैं. सवाल उठता है कि हमलावर कौन थे?”
वह आगे कहते हैं, “इस देश में ऐसे लोग हैं, जो बिना पहचान के हमारी सुरक्षा कर रहे हैं. अगर हम एक देश के तौर पर उन लोगों को पहचान नहीं देंगे, तो बड़ी तस्वीर नहीं समझ पाएंगे. हमारी कमियां हैं, लेकिन हम एक काम करने वाला लोकतंत्र हैं. मतभेद होना स्वाभाविक है, मगर देश से ऊपर कुछ नहीं होता.”
‘55 की उम्र में खुद को ज्यादा क्रिएटिव महसूस करता हूं’
अपने करियर को लेकर माधवन कहते हैं कि अब सोलो हीरो वाली सोच उनके लिए मायने नहीं रखती. उन्होंने कहा, “आज भी मुझे लगता है कि मैंने अपनी पूरी क्षमता से काम करना अभी शुरू ही किया है. जिन किरदारों को मैं निभा सकता हूं, उनके सतही पहलुओं को भी मैंने अभी नहीं छुआ है. मेरी आने वाली फिल्में दिखाएंगी कि निर्देशक और लेखक मुझ पर कितना भरोसा करते हैं.”
‘सिर्फ सोलो लीड वाली सोच गलत है’
फिल्म इंडस्ट्री की मानसिकता पर बात करते हुए माधवन कहते हैं, “इंडस्ट्री आपको यकीन दिलाती है कि सिर्फ सोलो लीड वाली फिल्म ही सफल होती है. लेकिन हॉलीवुड में अल पचीनो, रॉबर्ट डी नीरो और जैक निकोलसन जैसे कलाकारों ने कई नॉन-लीड लेकिन बेहद प्रभावशाली रोल किए हैं.”
वह उदाहरण देते हैं, “'रंग दे बसंती’ में मैं नौ मिनट के लिए था, फिर भी वह लीड रोल था. ‘3 इडियट्स’ में हम सभी लीड थे. ‘शैतान’ में मेरा किरदार पैरेलल लीड था.” वहीं ‘धुरंधर’ में रणवीर सिंह की भूमिका पर बात करते हुए माधवन कहते हैं, “क्या आप कहेंगे कि रणवीर लीड एक्टर नहीं हैं? स्क्रीन टाइम उन्हें सबसे ज्यादा मिला है. लेकिन एक कदम पीछे हटकर दूसरे कलाकार को कहानी आगे बढ़ाने देना ही आइकॉनिक फिल्में बनाता है. अब पैरेलल लीड ही भविष्य का रास्ता है.”
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