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Ikkis Movie Review
फिल्म: इक्कीस
स्टारकास्ट : धर्मेंद्र, अस्तय नंदा, जयदीप अहलावत, सिमर भाटिया
रेटिंग: 4/ 5
Ikkis Movie Review: इक्कीस तोपों की सलामी बनती है मैडॉक फिल्म्स और निर्देशक श्रीराम राघवन की फिल्म ‘Ikkis’ को. इस फिल्म से उम्मीदें पहले से ही काफी ज्यादी थीं और इसकी वजह भी साफ थी. जी हां, एक तरफ मैडॉक फिल्म्स, जो स्त्री, भेड़िया, छावा जैसे दमदार प्रोजेक्ट्स दे चुकी है, और दूसरी तरफ श्रीराम राघवन, जिनके नाम पर अंधाधुन, बदलापुर, जॉनी गद्दार जैसी आइकॉनिक फिल्में दर्ज हैं. अब जब ये दोनों साथ आए हैं, तो कहानी है 1971 के भारत-पाक युद्ध के असली हीरो Second Lieutenant Arun Khetarpal की.
फिल्म की कहानी
‘Ikkis’ भारत के सबसे कम उम्र के परमवीर चक्र अवार्ड लेने वाले अरुण खेतरपाल की सच्ची कहानी पर आधारित है. एक ऐसा जांबाज अफसर, जिसने अपने टैंक में आग लगने के बाद भी उसे छोड़ने से इनकार कर दिया और दुश्मन के आखिरी टैंक को तबाह करते हुए देश के लिए शहीद हो गए.
फिल्म सिर्फ युद्ध नहीं दिखाती, बल्कि एक बेटे, एक सैनिक और एक इंसान की पूरी जर्नी को सामने लाती है. कहानी उस वक्त और ज्यादा इमोशनल हो जाती है, जब सालों बाद एक पाकिस्तानी ब्रिगेडियर, Arun Khetarpal की बहादुरी की कहानी उनके पिता को सुनाता है. पिता का किरदार निभाया है धर्मेंद्र ने, और यही सीक्वेंस फिल्म को एक अलग ही लेवल पर ले जाता है.
‘इक्कीस’ का निर्देशन
श्रीराम राघवन का निर्देशन फिल्म की सबसे बड़ी ताकत है. इक्कीस में कोई भी सीन ओवर-द-टॉप नहीं लगता. हर फ्रेम में सच्चाई साफ नजर आती है. युद्ध के सीन बेहद रॉ और इम्पैक्टफुल हैं. इसके साथ ही एक खास सीन जहां मिसाइल टैंक के अंदर घुसती है और अगस्त्य नंदा के चेहरे के पास से गुजरती हुई ब्लड ट्रेल दिखाती है. वो सीन टेक्निकली और इमोशनली दोनों ही तरह से रोंगटे खड़े कर देता है. वहीं सिनेमेटोग्राफी शानदार है, डिटेलिंग शार्प है और इंटेंसिटी पूरी तरह कंट्रोल्ड है.
एक्टिंग
अगस्त्य नंदा ने इस फिल्म से सबको चौंका दिया है. Archies फिल्म में चॉकलेट बॉय दिखने वाले अगस्त्य यहां पूरी तरह ट्रांस्फॉर्म हो चुके हैं. अरुण खेतरपाल के रोल में उनकी sincerity और इंटेंसिटी साफ नजर आती है. ये कहना गलत नहीं होगा कि ये उनका अब तक का best परफॉरमेंस है.
लेकिन फिल्म की असली आत्मा हैं धर्मेंद्र. यह जानते हुए कि ये उनकी आख़िरी फिल्म हो सकती है, उनका हर सीन और भी ज्यादा भारी लगने लगता है. उनकी डायलॉग डिलीवरी, एक्सप्रेशंस और स्क्रीन प्रजेंस दिल भर देती है. फिल्म के आखिर में जब वो सिर्फ 'रब राखा' कहते हैं और चुपचाप चलते हुए फ्रेम से बाहर जाते हैं, वो पल आपको अंदर तक हिला देता है.
वहीं जयदीप अहलावत अपने लिमिटेड स्क्रीन टाइम में भी गहरी छाप छोड़ते हैं. खासकर वो सीन, जब वो धर्मेंद्र को उनके बेटे की बहादुरी की कहानी सुनाते हैं और सवाल आता है, 'तुम्हें ये सब कैसे पता?”. उसका जवाब आपको हिला कर रख देगा.वहीं लव इंटरेस्ट के रोल में सिमर भाटिया फ्रेश लगती हैं.
फर्स्ट हाफ vs सेकंड हाफ
फिल्म का पहला हाफ अरुण खेतरपाल के संघर्ष को दिखाता है. दूसरा हाफ पूरी तरह वॉर और इमोशंस के नाम है. क्लाइमेक्स न सिर्फ शानदार है, बल्कि हार्टब्रेकिंग भी. कुल मिलाकर ‘इक्कीस’ सिर्फ एक वॉर फिल्म नहीं, बल्कि जज़्बातों का तूफान है. ये फिल्म हर हिंदुस्तानी को देखनी चाहिए. ये धर्मेंद्र जी की आख़िरी फिल्म है, तो इससे बेहतर फेयरवेल हिंदी सिनेमा को शायद ही मिल सकता था.
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