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इंदिरा गांधी की सरकार में पेश किया गया था 'ब्लैक बजट' Photograph: (File Photo)
India's Black Budget: वित्त मंत्री निर्मला सीतारमण 1 फरवरी, 2026 को देश का बजट पेश करेंगी. मोदी सरकार के इस बजट से हर किसी को काफी उम्मीदें हैं. किसी को टैक्स में राहत मिलने की उम्मीद है तो आम आदमी बजट में महंगाई से राहत मिलने की आस लगाए बैठा है. किसानों को भी इस वर्ग से उम्मीदें हैं. यानी एक फरवरी को आने वाले इस बजट पर देशभर की निगाहें टिकी हुई हैं. ऐसे में हम आपको भारत के इतिहास के एक ऐसे बजट के बारे में बताने जा रहे हैं. जो आजतक सिर्फ एक बार ही हुई. जिसके पीछे की वजह पाकिस्तान था. दरअसल, अब से 53 साल पहले इंदिरा गांधी की सरकार में भारत का ब्लैक बजट यानी काला बजट पेश किया गया था. तो चलिए जानते हैं इस बजट को काला बजट क्यों कहा जाता है.
1973-74 में पेश किया गया था ब्लैक बजट
दरअसल, भारत का ब्लैक बजट यानी काला बजट साल 1973-74 में पेश किया गया था. तब इंदिरा गांधी की सरकार थी. उनकी सरकार में वित्त मंत्री यशवंतराव चव्हाण थे. ये बजट बेहद खास था क्योंकि इस बजट में सरकार ने खुले तौर पर इस बात को स्वीकार किया था कि उस साल सरकार को भारी घाटा हुआ. बता दें कि आमतौर पर हर सरकार संतुलित बजट पेश करने की कोशिश करती हैं, लेकिन 1973-74 में हालात इतने खराब थे कि सरकार के सामने घाटे के बिना देश चलाना नामुमकिन हो गया था.
जानें क्यों कहा जाता है उसे काला बजट
बता दें कि इंदिरा सरकार के उस बजट को ब्लैक बजट यानी काला बजट कहा जाता है जो आज इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया. दरअसल, इस बजट में सरकार के खर्च और आमदनी के बीच बड़ा अंतर साफ देखने को मिला था. सरकार के खजाने में जितना पैसा आया उससे कहीं ज्यादा पैसा खर्च हुआ था. दरअसल, तब ज्यादा पैसा खर्च करने की सरकार की मजबूरी बन गई थी.
तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने इस बात को खुद संसद में स्वीकार किया था कि देश की आर्थिक हालत बेहद नाजुक हो चुकी है. ऐसे में सख्त फैसले लेने के अलावा उनके पास कोई रास्ता नहीं बचा है. रिपोर्ट्स की मानें तो इंदिरा सरकार के इस बजट में करीब 550 करोड़ रुपये का घाटा हुआ था. अगर इस रकम को आज के हिसाब से देखा जाए तो लाखों करोड़ रुपये हो सकती है. भारी भरकम घाटे के चलते इस बजट को ब्लैक बजट नाम दिया गया था. जो इतिहास के पन्नों में दर्ज हो गया.
क्यों उठाना पड़ा था इंदिरा सरकार को घाटा
दरअसल, इस घाटे के पीछे की वजह पाकिस्तान था. क्योंकि साल 1971 में भारत और पाकिस्तान के बीच युद्ध हुआ. इस युद्ध ने देश की आर्थिक ताकत को भारी नुकसान पहुंचाया. भारत पर आर्थिक बोझ बढ़ गया. इस युद्ध के बाद शरणार्थियों की जिम्मेदारी के अलावा रक्षा खर्च और पुनर्निर्माण से सरकार को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा. इस युद्ध के बाद 1973 में मानसून ने भी धोखा दे दिया. जिसके चलते देश के कई हिस्सों में भीषण सूखा पड़ गया और किसानों की फसलें बर्बाद हो गईं.
खेती पर निर्भर रहने वाली भारत की अर्थव्यवस्था को इस सूखेसे दोहरी मार पड़ी. जब 1973-74 में तत्कालीन वित्त मंत्री यशवंतराव चव्हाण ने बजट पेश किया तो उन्होंने साफ कर दिया कि सरकार भारी घाटे में है और अब उन्हें खर्चों में कटौती करनी पड़ेगी. इस बजट में कई सरकारी योजनाओं को बंद करना पड़ा. जबकि योजनाओं का बजट कम कर दिया गया और तमाम गैर-जरूरी खर्चों को कम करने को कोशिश की गई. जिसका मकसद किसी भी तरह से सरकारी खजाने में पैसा बनाए रखना था, जिससे ये पूरी तरह से खाली ना हो जाए.
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