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plane crash in ahemdabad Photograph: (social media)
US-Iran War: मिडिल ईस्ट में युद्ध के दौरान बड़ा खेल चल रहा है. मिसाइल हमलों के बीच एक अदृश्य शक्ति काम कर रही है, जिसके कारण आम जनता की जान को भी खतरा है. यह एक ​डिजिटल फॉल्ट की तरह है. इसे ‘जीपीएस स्पूफिंग’ (GPS Spoofing) का नाम दिया गया है. इसमें हवाई जहाज में बैठे पायलट को लगता है कि वो सही और सुरक्षित अपने डेस्टिनेशन की ओर बढ़ रहा है. मगर असल में वह गुमराह हो चुका है. वह दुश्मन की ओर बढ़ रहा होता है.
क्या होती है GPS स्पूफिंग?
ये एक तरह का फर्जी सिग्नल है. इसमें किसी को सही दिशा से भटकाने की कोशिश होती है. दुश्मन अपने टार्गेट को पहले भटकाता है. जब टार्गेट रेज में आता को उस पर हमला हो जाता है. ईरान और अमेरिका के बीच बढ़ रहे तनाव में इस तकनीक को एक खतरनाक ​​हथियार बनाया है. इससे अब आम नागरिकों की फ्लाइट्स भी सुरक्षित नहीं बची हैं.
स्क्रीन पर सब कुछ सही दिखाई देता
जैमिंग में तो सिग्नल गायब होते हैं. इससे पायलट को पता चल जता है कि कुछ गड़बड़ है. मगर स्पूफिंग में विमान के कंप्यूटर को एक गलत सिग्नल मिल जाता है. पायलट को अपनी स्क्रीन पर सब कुछ सही दिखाई देता है. मगर उसकी लोकेशन गड़बड़ हो जाती है. यह ऐसा है जैसे गूगल मैप को हैक कर लेना. आप अपने घर जाने बजाए किसी गहरे भवर में फंस जाते हैं
ईरान ने स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम को तैनात किया
ईरान ने कोबरा V8 (Cobra V8) जैसे स्वदेशी इलेक्ट्रॉनिक वॉरफेयर सिस्टम को तैनात किया है. ये सिस्टम 250 किलोमीटर की तक सिग्नल को खराब करने में सक्षम है. इनका लक्ष्य है ​कि दुश्मन की मिसाइलों और ड्रोन को रास्ते से भटकाना है. मगर अब इनकी चपेट में अब कमर्शियल एयरलाइंस भी आ रही हैं. एक मार्च से अब तक करीब एक हजार जहाजों और सैकड़ों उड़ानों ने इन फर्जी सिग्नलों को लेकर शिकायत दर्ज कराई है.
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अचानक जहाज को ईरानी सीमा के अंदर दिखा
पायलटों के लिए ये काफी खराब अनुभव है. हाल की घटनाओं में देखा जाए तो विमान के नेविगेशन सिस्टम ने अचानक जहाज को ईरानी सीमा के अंदर दिखा दिया. जबकि असल में वह इंटरनेशनल एयरस्पेस में मौजूद था. अगर पायलट इस सिग्नल पर अगर भरोसा कर ले तो वह गलती से मिलिट्री जोन में पहुंच सकता है. यहां पर उसे दुश्मन समझकर मारा भी जा सकता है.
एंटी-स्पूफिंग सॉफ्टवेयर को लगाया जा रहा
इससे बचाव के लिए नए विमानों में एंटी-स्पूफिंग सॉफ्टवेयर को लगाया जा रहा है. पायलटों को अब पुराने जमाने के रेडियो बीकन और जिकल मैप (नक्शे) के उपयोग की ट्रेनिंग दी जा रही है. जब भी डिजिटल डिस्प्ले अजीब हरकत करे तो पायलटों को जमीन से मिलने वाले सिग्नल और अपनी आंखों पर भरोसा करना होगा.
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