युद्ध के कगार पर इजरायल, लेकिन भारतीय श्रमिकों का जोश बरकरार

फिलिस्तीनी श्रमिकों की कमी के बाद इजरायल ने जिन पर सबसे अधिक विश्वास जताया-वे भारतीय कामगार हैं.

फिलिस्तीनी श्रमिकों की कमी के बाद इजरायल ने जिन पर सबसे अधिक विश्वास जताया-वे भारतीय कामगार हैं.

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Mohit Saxena
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मध्य-पूर्व में तनाव अपने चरम पर है. ईरान के साथ संभावित युद्ध की आशंका, मिसाइल अलर्ट और सुरक्षा सायरन-इन सबके बीच भी इजरायल के शहरों में एक तस्वीर अलग दिखाई देती है. यह तस्वीर है भारतीय श्रमिकों के साहस, समर्पण और आत्मविश्वास की. बिहार से राजस्थान, पंजाब से तमिलनाडु तक-हजारों भारतीय कामगार आज उस इजरायल में पुनर्निर्माण का काम कर रहे हैं, जहां पिछले साल ईरान की मिसाइलों ने रिहायशी इमारतों और बुनियादी ढांचे को भारी नुकसान पहुंचाया था. 

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2023 के बाद बदले सुरक्षा परिदृश्य

टूटे अपार्टमेंट, क्षतिग्रस्त सड़कें, और जले हुए ढांचों को फिर से खड़ा करने की जिम्मेदारी इन भारतीय हाथों पर है. इन श्रमिकों का चयन भारत–इज़रायल द्विपक्षीय श्रम समझौते, राज्य सरकारों के सहयोग और 2023 के बाद बदले सुरक्षा परिदृश्य में इजरायल के भारतीय श्रमिकों पर बढ़ते भरोसे के तहत हुआ. फिलिस्तीनी श्रमिकों की कमी के बाद इजरायल ने जिन पर सबसे अधिक विश्वास जताया-वे भारतीय कामगार हैं.

इमारत टूटी थी-हमने फिर से बनाई

ग्राउंड पर बात करने पर इनकी आवाज़ में डर नहीं, बल्कि दृढ़ निश्चय सुनाई देता है. एक बिहारी मज़दूर कहता है, “मिसाइल गिरी थी, इमारत टूटी थी-हमने फिर से बनाई. अगर जंग भी हुई, तो काम नहीं रोकेंगे.” राजस्थान से आए एक कंस्ट्रक्शन वर्कर का कहना है, “घर पर परिवार जानता है कि काम जोखिम भरा है, लेकिन यही रोज़गार हमारी पहचान है.”

भरोसे और रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक

सुरक्षा प्रोटोकॉल सख्स हैं-सायरन बजते ही शेल्टर, हेलमेट और सेफ्टी गियर अनिवार्य-लेकिन काम रुका नहीं है. यह सिर्फ़ मजदूरी नहीं, बल्कि भरोसे और रणनीतिक साझेदारी का प्रतीक बन चुका है. युद्ध की आशंका के बीच इज़रायल का पुनर्निर्माण जारी है और उस पुनर्निर्माण की रीढ़ बने हैं भारतीय श्रमिक-जो कहते हैं, “डर से नहीं, काम से पहचान बनती है.”

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