ईरान की इस ताकत के कारण क्या ट्रंप के कदम ठिठके? एक झटके में टली हमले की योजना

बीते दिनों अमेरिका और ईरान के बीच बड़ी जंग टल गई. इसके पीछे अमेरिका की उदारता नहीं बल्कि ईरान की सैन्य ताकत और भौगोलिक हालात हैं. आइए जानतें हैं  किन कारणों से बदले समीकरण.

बीते दिनों अमेरिका और ईरान के बीच बड़ी जंग टल गई. इसके पीछे अमेरिका की उदारता नहीं बल्कि ईरान की सैन्य ताकत और भौगोलिक हालात हैं. आइए जानतें हैं  किन कारणों से बदले समीकरण.

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Mohit Saxena
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Khamnei and Trump

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अमेरिका और ईरान के बीच जंग होते-होते रह गई. हाल ही में ऐसा माहौल बना ​था कि कभी बड़ी सैन्य टकराहट हो सकती है. इसकी आशंका तब और बढ़ गई जब अमेरिका ने ईरान को लेकर एक एडवाइजरी जारी की थी कि कतर ने अपने अल-उदैद एयर बेस जो मध्य पूर्व में अमेरिका का सबसे बड़ा एयर बेस है, यहां से कुछ सैनिकों को हटने के आदेश दिए गए थे. अमेरिका की ओर से बयान सामने आया है कि ईरान अगर प्रदर्शनकारियों को फांसी देता है तो अमेरिका कड़ी कार्रवाई करेगा. यह वाक्या बुधवार 14 जनवरी का था. मगर अगले ही दिन यानि 15 जनवरी गुरुवार की शाम को ट्रंप ये कहते हुए नजर आए, 'हमें यह बताया गया है कि ईरान में हत्याएं रुक गई हैं. अब फांसी की किसी तरह की योजना नहीं है.' इसके बाद अल-उदैद एयर बेस पर सुरक्षा अलर्ट के स्तर को घटा लिया गया था. 

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ट्रंप ने राष्ट्रीय सुरक्षा टीम को निर्देश दिया था

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार, इस एयरबेस को आनन फानन में खाली कराया गया था, मगर अब यहां पर विमान वापस लौट रहे हैं. ऐसा दावा किया जा रहा है कि अमेरिकी सेना इस हमले के लिए बिल्कुल तैयार नहीं थी. ट्रंप ने अपनी राष्ट्रीय सुरक्षा टीम को निर्देश दिया था कि वे तभी कार्रवाई करेंगे जब वे शासन के खिलाफ निर्णायक प्रहार की पूरी गारंटी दें. जिस तरह से वेनेजुएला में अमेरिका ने तख्ता पलट का खेल खेला था. उसी तरह की सफलता ट्रंप यहां पर चाह रहे थे. मगर सीमित विकल्पों और क्षमताओं के कारण अमेरिकी सेना ईरान पर हमला करने को तैयार नहीं हुई.

ईरान की सेना कितनी ताकतवर  

ईरानी सेना ने जून 2025 में अमेरिका की कार्रवाई के बाद से खुद को काफी मजबूत कर लिया है. उसने अपनी सैन्य तैयारियों को काफी धार दी है. पिछली बार अमेरिका अपने बी-2  बॉम्बर की मदद से उसके परमाणु कार्यक्रम को तबाह करने की कोशिश की गई थी. मगर 12 दिनों के संघर्ष के बाद भी अमेरिका सफल नहीं हो पाया. यह युद्ध ईरानी सेना के लिए एक अनोखा अनुभव था. इसने ईरान की ताकत को बढ़ाया. सैनिकों की ट्रेनिंग का स्तर ऊंचा किया गया. इसके साथ अलग-अलग यूनिट्स के बीच तालमेल को बेहतर किया गया. 

ईरान की भौगोलिक स्थिति रही है फायदेमंद 

दरअसल आधुनिक युद्ध के दौर में जमीनी हमले की आशंका कम ही रहती है. अमेरिका के पास बी-2 बॉम्बर और कई तरह की खतरनाक मिसाइलें हैं. इनके माध्यम से हवाई हमले हो सकते हैं. मगर पूरा कंट्रोल पाने के लिए जमीनी हमला जरूरी है। योजना बनाते वक्त ईरान के भौगोलिक हालात को अनदेखा नहीं किया जा सकता है. ईरान मजबूत प्राकृतिक सीमाओं से घिरा है. ये दुश्मन के लिए बड़ी रुकावट है. ईरान के चारों ओर प्राकृतिक सुरक्षा है. इसके उत्तर में कैस्पियन सागर, दक्षिण में फारस की खाड़ी और ओमान की खाड़ी मौजूद है.

वहीं पूर्व और पश्चिम में रेगिस्तान और पहाड़ मौजूद हैं. इसके साथ पश्चिमी सीमा पर जाग्रोस पर्वत श्रृंखला और उत्तर में एल्बुर्ज पर्वत भी मौजूद है. ये किसी भी पैदल सेना के लिए मुश्किल पैदा करने वाला है. इतिहास में भी कई बार इन पहाड़ों ने आक्रमण करने वाली फौजों को रोक दिया. 1980 के दशक में ईरान और इराक के बीच युद्ध हुआ. सद्दाम हुसैन की सेना ने 1980 में ईरान पर अटैक किया था लेकिन जाग्रोस पहाड़ों के कारण इराकी सेना ईरान में घुस नहीं सकी और युद्ध ज्यादा दिन तक टिक नहीं सका. 

ईरान की ताकत 

आपको बता दें कि ईरान विश्व स्तर की शीर्ष 20 सैन्य शक्तियों वाले देशों में शामिल है. 145 सैन्य शक्तियों में ईरान 16वें पायदान पर है. ईरान में 6.10 लाख सक्रिय सैनिक और 3.50 लाख रिजर्व फोर्स के सैनिक मौजूद हैं. इनकी कुल संख्या 9.60 लाख के करीब है. वहीं ईरान में रिवॉल्यूशनरी गार्ड्स कोर (आईआरजीसी) एक अलग यूनिट भी मौजूद है. उसके पास मिडिल ईस्ट में सबसे ज्यादा मिसाइलें मौजूद हैं. बताया जाता कि उसके पास करीब तीन हजार बैलिस्टिक मिसाइलें हैं. वहीं क्रूज मिसाइलों का अलग जखिरा है.  

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