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India-EU Deal
India-EU Deal: यूरोपीयन यूनियन और भारत के बीच हुई ट्रेड डील की वजह से पूरी दुनिया में चर्चाएं शुरू हो गईं हैं. हालांकि, अब तक इस डील पर किसी भी देश की आधिकारिक टिप्पणी सामने नहीं आई है लेकिन एक्सपर्टस कहते हैं कि हर देश में इस बारे में बात हो रही है.
अमेरिकी मीडिया ने प्रमुखता से इस डील को कवर किया है. न्यूयॉर्क टाइम्स ने तो यहां तक कह दिया कि ट्रंप की वजह से 17 सालों से ठंडे बस्ते में पड़ा समझौता हो गया है. एनटी ने लिखा कि ईयू और भारत के नेताओं ने करीब 2 दशक की बातचीत के बाद मंगलवार को व्यापार समझौते की घोषणा की. डोनाल्ड ट्रंप की वजह से दोनों पक्षों ने इस डील को साइन किया. खास बात है कि ये डील ऐसे वक्त पर हुई है, जब विश्वसनीय आर्थिक साझेदार के रूप में अमेरिका की विश्वसनीयता गिरती जा रही है और चीन सस्ते सामानों से दुनिया पर कब्जा जमा रहा है.
अमेरिका में इसस डील की वजह डोनाल्ड ट्रंप की नाकामी और चीन के खिलाफ भारत और यूरोप की जवाबी तैयारी को माना जा रहा है. ट्रंप ने अब तक इस डील पर आधिकारिक रूप से कुछ नहीं कहा है. भारत-ईयू डील से पहले अमेरिका के वित्त मंत्री स्कॉट बेसेंट ने कहा था कि भले ही यूरोपी ने रूस के साथ अपने तेल की खरीदी को खत्म कर लिया है लेकिन अब वे भारत में रिफाइन होने वाले रूसी तेल उत्पादों को खरीदेंगे. ऐसा करके यूरोप अप्रत्यक्ष रूप से रूस-यूक्रेन युद्ध को फंडिंग कर रहे हैं. अमेरिकी वित्त मंत्री के बयान से ही साफ है कि अमेरिका नहीं चाहता था कि भारत और यूरोप के बीच ये समझौता हो.
क्यों नहीं चाहता था अमेरिका
अमेरिका दो वजहों से दुनिया में सुपरपावर का खिताब लेकर बैठा है और वह वजह है- तकनीक और गठबंधन. अमेरिका को हमेशा यूरोप का समर्थन मिला है. यूरोप ने अपनी पूरी ताकत अमेरिका को दी है, जिस वजह से यूरोप अब खुद अमेरिका पर निर्भर होने लगा. खास बात है कि खुद यूरोप को इस बात का एहसास नहीं हुआ. हालांकि, डोनाल्ड ट्रंप जब से दूसरी बार अमेरिका की सत्ता में आए, यूरोप को इस बात का एहसास हो गया.
चीन इस डील को लेकर क्या सोच रहा
मामले में चीन की हालात तो और अजीब हो गई है. चीन को ये बात अच्छे से पता है कि अमेरिका जो सामान यूरोप को देता था, वह सामान तो भारत यूरोप को नहीं देगा लेकिन जो सामान चीन यूरोप को देता है, वह सामान भारत भी यूरोप को दे सकता है. चीन इसी वजह से यूरोप को साधने में लगा है. कनाडा के प्रधानमंत्री चीन से इस बारे में बात कर रहे हैं और फिनलैंड के प्रधानमंत्री भी चीन में बैठे हैं.
ब्रिटिश प्रधानमंत्री भी चीन जाने वाले हैं. चीन का कहना है कि अमेरिका समर्थक देशों के साथ वे ऐसे समझौते कर ले, जिससे दुनिया में उसकी बादशाहत कायम हो. चीन इसी वजह से यूरोप को दोस्ती के ऑफर दे रहा है.
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