Bangladesh Election: क्या 'जमात' को समर्थन दे रहा अमेरिका? पार्टी का चुनाव में जीतना भारत के लिए बड़ा खतरा

अमेरिका ने बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी के साथ अपने संपर्क और संवाद को काफी बढ़ा दिया है. जमात-ए-इस्लामी चुनाव में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने का अनुमान है.

अमेरिका ने बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी के साथ अपने संपर्क और संवाद को काफी बढ़ा दिया है. जमात-ए-इस्लामी चुनाव में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने का अनुमान है.

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Mohit Saxena
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Bangladesh election 2026, Sheikh Hasina Awami League ban, BNP vs Jamaat vs NCP, Yunus interim government updates

बांग्लादेश की पूर्व प्रधानमंत्री शेख हसीना के सत्ता छोड़ने और देश से जाने के करीब डेढ़ साल बाद अब यहां पर फरवरी में चुनाव होने वाले हैं. इसके बाद हसीना की पार्टी अवामी लीग को चुनाव लड़ने पर प्रतिबंधित दिया है. ऐसे में अब इस्लामवादी पार्टी जमात-ए-इस्लामी के लिए रास्ता साफ हो चुका है. इसी बीच ऐसी खबर सामने आ रही है कि अमेरिका ने बांग्लादेश की सबसे बड़ी इस्लामवादी पार्टी के साथ अपने संपर्क और संवाद को काफी बढ़ा दिया है. 

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बांग्लादेश अब इस्लामिक दिशा में शिफ्ट हो चुका है

मीडिया रिपोर्ट के अनुसार,अमेरिकी राजनयिकों ने संकेत दिए कि वे जमात-ए-इस्लामी के साथ करने को तैयार हैं. यह वही पार्टी है जिस पर बांग्लादेश में कई प्रतिबंध लग चुके है. मगर इस बार पार्टी को अमेरिका का साथ मिल रहा है. अमेरिकी राजनयिक ने कहा कि बांग्लादेश अब इस्लामिक दिशा में  शिफ्ट हो चुका है. उन्होंने अनुमान जताया कि जमात-ए-इस्लामी 12 फरवरी को होने वाले चुनाव में अब तक का सबसे बेहतर प्रदर्शन करेगी. ऑडियो रिकॉर्डिंग के अनुसार, राजनयिक ने कहा, 'हम चाहते हैं कि वे हमारे मित्र बने.'

शरिया कानून को लेकर चिंता को किया खारिज

अमेरिकी राजनयिक ने दावा किया कि अगर जमात-ए-इस्लामी बांग्लादेश में शरिया कानून लागू करती है तो अमेरिका अगले ही दिन पर 100 प्रतिशत टैरिफ लगाएगा. हालांकि, ढाका में मौजूद अमेरिकी दूतावास की प्रवक्ता मोनिका शाई ने कहा कि यह बातचीत एक “रूटीन और ऑफ-द-रिकॉर्ड चर्चा” थी. इसमें कई राजनीतिक दलों पर बात हुई. उन्होंने यह साफ कर दिया कि अमेरिका किसी एक पार्टी का समर्थन नहीं करता है. वह उसी सरकार के साथ काम करेगा, जिसे बांग्लादेश की जनता चुनने वाली है. 

जमात-ए-इस्लामी का विवादित इतिहास

आपको बता दें कि जमात-ए-इस्लामी की स्थापना 1941 में इस्लामी विचारक सैयद अबुल आला मौदूदी ने की. पार्टी ने बांग्लादेश की पाकिस्तान से आजादी का काफी विरोध किया. 1971 के युद्ध में जमात  के वरिष्ठ नेताओं ने पाकिस्तानी सेना का पूरा ​साथ दिया. उन पर आजादी समर्थक हजारों नागरिकों की हत्या का आरोप लगा. 2009 में सत्ता में लौटने के बाद शेख हसीना ने अंतरराष्ट्रीय अपराध न्यायाधिकरण के तहत जमात नेताओं पर युद्ध अपराधों के केस चलवाए. इसके बाद पार्टी पर रोक भी लगाई गई.  इस कार्रवाई के बाद जमात लंबे वक्त तक राजनीतिक रूप से बाहर निकल गया. 

2024 के बाद बदली राजनीतिक तस्वीर

2024 में छात्र आंदोलन के बाद शेख हसीना को सत्ता से हटना पड़ा. इसके बाद जमात-ए-इस्लामी पर लगा प्रतिबंध को हटा लिया गया. इसके बाद पार्टी ने खुद को दोबारा संगठित करते हुए बड़ी राजनीतिक ताकत के रूप में स्थापित कर लिया. शफीकुर रहमान, मिया गोलाम परवर और सैयद अब्दुल्ला मोहम्मद ताहेर के नेतृत्व में अपना जनाधार तैयार किया. जमात ने हाल ही में अपनी छवि को नरम किया है.  भ्रष्टाचार विरोधी मुद्दों पर जोर देने का प्रयास किया है. पार्टी ने हाल ही में नेशनल सिटीजन पार्टी (NCP) के साथ गठबंधन किया है. यह पार्टी छात्र आंदोलन के बाद से उभरी थी, हालांकि इस गठबंधन को लेकर NCP के अंदर विरोध देखने को मिला.

भारत के लिए चिंता वाली बात 

जमात-ए-इस्लामी से अमेरिकी का संपर्क चिंता का विषय है. भारत ने 2019 में कश्मीर में जमात-ए-इस्लामी को गैरकानूनी संगठन घोषित ​कर दिया था. 2024 में इस प्रतिबंध को दोबारा बढ़ाया गया. इंटरनेशनल क्राइसिस ग्रुप के थॉस कीन ने अल-जजीरा से कहा कि अगर जमात सत्ता में आती है तो भारत-बांग्लादेश रिश्तों को दोबारा पटरी पर लाना असंभव हो जाएगा. 

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