ट्रेन तो 'वर्ल्ड क्लास' मिल गई, साहब... पर 'सिविक सेंस' कहां से लाएंगे? देखें जरा ये वीडियो

देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद कोच में फैली गंदगी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इस घटना ने आधुनिक सुविधाओं के साथ यात्रियों की नागरिक जिम्मेदारी और सिविक सेंस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन के उद्घाटन के कुछ ही दिनों बाद कोच में फैली गंदगी का वीडियो सोशल मीडिया पर वायरल हो गया. इस घटना ने आधुनिक सुविधाओं के साथ यात्रियों की नागरिक जिम्मेदारी और सिविक सेंस पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं.

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Ravi Prashant
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वंदे भारत एक्सप्रेस वायरल वीडियो Photograph: (X/@Indianinfoguide)

भारत में विकास की रफ्तार अब पटरियों पर 'वंदे भारत' बनकर दौड़ रही है, लेकिन अफसोस कि हमारे 'सिविक सेंस' की रफ्तार आज भी बैलगाड़ी के युग में अटकी हुई है. प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने शुक्रवार को बड़े गर्व के साथ देश की पहली वंदे भारत स्लीपर ट्रेन को हरी झंडी दिखाई ही थी कि उद्घाटन के मात्र दो दिन के भीतर ही इसकी 'सुंदरता' को दागदार करने वाली तस्वीरें सामने आ गई हैं.

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सोशल मीडिया पर वायरल हो रहे एक वीडियो ने न केवल रेलवे प्रशासन, बल्कि हर उस भारतीय को सोचने पर मजबूर कर दिया है जो विकास की बात तो करता है, लेकिन जिम्मेदारी से भागता है. दरअसल, एक वीडियो सामने आया है, जिसे देखने के बाद आप सोचने के लिए मजबूर हो जाएंगे. वायरल वीडियो ने कई सारे सवाल खड़े किए हैं.

वीडियो में साफ देखा जा सकता है कि जिस कोच को वर्ल्ड क्लास सुविधाओं से लैस किया गया है. वहां यात्रियों ने खाने-पीने के बाद सारा कूड़ा डस्टबिन के बजाय सीधे फर्श पर फैला दिया है. दही के रैपर और अन्य कचरा कोच के गलियारे में इस कदर बिखरा है कि लगता ही नहीं यह वही लग्जरी ट्रेन है जिसका सपना देश देख रहा था. 

सुविधाओं की भूख लेकिन जिम्मेदारी से परहेज

हैरानी की बात यह है कि ट्रेन को शुरू हुए अभी एक हफ्ता भी नहीं बीता है. हम मांग तो 'बुलेट ट्रेन' जैसी सुविधाओं की करते हैं, लेकिन हमारा व्यवहार आज भी 'जनरल बोगी' वाला ही है. डस्टबिन बगल में होने के बावजूद कचरा फर्श पर फेंकना हमारी उस मानसिकता को दर्शाता है, जहां हम मानते हैं कि "सफाई करना सिर्फ सरकार का काम है, गंदा करना हमारा जन्मसिद्ध अधिकार." क्या हम वाकई इन आधुनिक सुख-सुविधाओं के हकदार हैं, जब हम एक छोटे से रैपर को उसकी सही जगह पर नहीं पहुंचा सकते?

पीएम मोदी ने क्या कहा? 

यह ट्रेन सिर्फ एक मशीन नहीं है, बल्कि प्रधानमंत्री मोदी के शब्दों में, यह 'मां काली की धरती' (हावड़ा) को 'माँ कामाख्या की भूमि' (गुवाहाटी) से जोड़ने वाला एक पवित्र सेतु है. लेकिन श्रद्धालुओं और यात्रियों की इस लापरवाही ने इस आध्यात्मिक जुड़ाव के अनुभव को भी फीका कर दिया है. जहां पर्यटन और धार्मिक यात्राओं को बढ़ावा देने की बात हो रही थी, वहां अब 'सिविक सेंस' पर सवाल उठने लगे हैं.

पीएम मोदी का विजन और भविष्य की चुनौती

शुक्रवार को मालदा टाउन रेलवे स्टेशन से इस ट्रेन को रवाना करते हुए प्रधानमंत्री मोदी ने बंगाल को हजारों करोड़ रुपये की परियोजनाओं की सौगात दी थी. उन्होंने स्पष्ट किया था कि यह पूरी तरह वातानुकूलित स्लीपर ट्रेन हावड़ा-गुवाहाटी रूट पर यात्रा के समय को 2.5 घंटे कम करेगी और आने वाले समय में ऐसी ही आधुनिक स्लीपर ट्रेनें पूरे देश में दौड़ेंगी.

पीएम मोदी का सपना देश के हर कोने को हाई-टेक कनेक्टिविटी से जोड़ना है, लेकिन मालदा से आई यह वायरल वीडियो एक चेतावनी है. सरकार पटरियां बिछा सकती है, आलीशान डिब्बे बना सकती है और यात्रा का समय कम कर सकती है, लेकिन वह यात्रियों को सिविक सेंस नहीं सिखा सकती. अगर हमें देश को वाकई विकसित बनाना है, तो वंदे भारत जैसी ट्रेनों के साथ-साथ हमें अपने 'सिविक सेंस' को भी पटरी पर लाना होगा. 

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