अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को लेकर जो दावा किया है उसने सिर्फ लैटिन अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को चौंका कर रख दिया है.
दुनिया के हर कोने में आज एक ही सवाल है. क्या कोई देश बिना युद्ध की घोषणा किए किसी दूसरे देश के राष्ट्रपति को उठा सकता है? जी बिल्कुल. अमेरिका ने वेनेजुएला के राष्ट्रपति निकोलस मादुरो को लेकर जो दावा किया है उसने सिर्फ लैटिन अमेरिका ही नहीं बल्कि पूरी दुनिया को चौंका कर रख दिया है. अमेरिका का कहना है कि यह एक गुप्त ऑपरेशन था जो कुछ ही मिनटों तक चला और जिसमें किसी आम नागरिक को नुकसान नहीं पहुंचा. लेकिन असली कहानी इस ऑपरेशन के आगे शुरू होती है. सवाल यह नहीं है कि ऑपरेशन कैसे हुआ?
दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार
सवाल यह है कि अमेरिका ने यह सब किया ही क्यों? और आमतौर पर इसका जवाब वेनेजुएला का तेल दिया जा रहा है. यह सच है कि वेनेजुएला के पास दुनिया का सबसे बड़ा तेल भंडार है और यह भी सच है कि तेल से ताकत, पैसा और वैश्विक नियंत्रण जुड़ा होता है. लेकिन अगर बात सिर्फ तेल की होती तो अमेरिका की बेचैनी इतनी गहरी नहीं होती. बात तो तेल से आगे की है. दरअसल अमेरिका को डर है कहीं चीन और रूस लैटिन अमेरिका में अमेरिका की जगह ना ले लें.
रूस भी वेनेजुएला को खुला समर्थन देता है
बीते कुछ वर्षों में वेनेजुएला चीन के काफी करीब आया है और चीन ने वहां तेल, इंफ्रास्ट्रक्चर और कर्ज के जरिए अपनी पकड़ मजबूत करी है. साथ ही अमेरिका के इस ऑपरेशन से कुछ ही घंटे पहले वेनेजुएला और चीन के बीच बातचीत भी हुई थी. और यही सब अमेरिका के लिए एक सीधा संकेत था कि चीन अब सिर्फ एशिया तक सीमित नहीं रहना चाहता. यहां बात सिर्फ चीन की नहीं बल्कि रूस भी वेनेजुएला को खुला समर्थन देता है.
अमेरिका इसे अपने लिए खतरा मानता है
चाहे सैन्य सहयोग हो या फिर राजनीतिक समर्थन. रूस ने लैटिन अमेरिका में मौजूदगी बढ़ाई है. अमेरिका की ऐसी सोच की जड़ में एक पुरानी नीति है जिसे मॉन्रो डॉक्ट्रिन कहा जाता है. इस नीति का मतलब साफ है कि लैटिन अमेरिका पर किसी और महाशक्ति का असर नहीं होना चाहिए और इसीलिए जब चीन और रूस इस क्षेत्र में अपने कदम बढ़ाते हैं तो अमेरिका इसे अपने लिए खतरा मानता है.
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