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क्रेडिट कार्ड Photograph: (Freepik)
देश में कई ऐसे मामले सामने आते हैं, जहां ग्राहकों ने किसी क्रेडिट कार्ड के लिए आवेदन ही नहीं किया होता, लेकिन अचानक उनके पते पर एक नया क्रेडिट कार्ड पहुंच जाता है. बैंक अक्सर प्रचार, मार्केटिंग या अपनी बिक्री बढ़ाने के चक्कर में ऐसे कार्ड जारी कर देते हैं, लेकिन भारतीय रिज़र्व बैंक (RBI) इसे गंभीर गलती और ग्राहक अधिकारों का उल्लंघन मानता है. आरबीआई ऐसे कार्ड्स को Unsolicited Credit Card कहता है, यानी वह कार्ड जो बिना ग्राहक की सहमति, मांग या औपचारिक आवेदन के जारी कर दिया जाए.
बिना अनुमित के जारी नहीं हो सकता है क्रेडिट कार्ड
आरबीआई के मुताबिक किसी भी बैंक को यह अधिकार नहीं है कि वह ग्राहक की स्पष्ट अनुमति के बिना उसके नाम पर क्रेडिट कार्ड जारी करे. ऐसा करना न सिर्फ अनैतिक है, बल्कि खतरनाक भी हो सकता है. इससे फ्रॉड, गलत बिलिंग, डेटा का दुरुपयोग, और अनजाने में होने वाली वित्तीय देनदारियां बढ़ने का खतरा रहता है. इसी वजह से रिजर्व बैंक ऐसे मामलों में ग्राहकों को पूरी सुरक्षा देता है और बैंक को तत्काल कार्रवाई के लिए बाध्य करता है.
घर आ गया तो क्रेडिट तो क्या करें?
अगर किसी ग्राहक के नाम पर बिना सहमति के क्रेडिट कार्ड जारी हुआ है, तो सबसे पहले घबराने की कोई जरूरत नहीं है, क्योंकि नियम उसके पक्ष में हैं। बैंक को यह कार्ड तुरंत बंद करना होगा और ग्राहक से एक रुपया भी नहीं लिया जा सकता। ग्राहक चाहे जिसकी भी स्थिति में हो, बैंक वार्षिक शुल्क, टैक्स, प्रोसेसिंग फीस, फ्यूल चार्ज या किसी भी प्रकार का बिल उस पर नहीं डाल सकता। आरबीआई यह स्पष्ट कर चुका है कि बिना मांगे कार्ड भेजना बैंक की गलती है, इसलिए उसकी किसी भी 0 से 1,00,000 तक की राशि का भुगतान ग्राहक से नहीं मांगा जा सकता.
बैंक को तुरंत करना चाहिए सुचित
आरबीआई जोर देकर कहता है कि ऐसे कार्ड आने पर ग्राहक कभी भी उसे सक्रिय नहीं करे. सक्रिय न करने का मतलब है कि न तो ओटीपी दर्ज करें, न कोई लिंक खोलें और न ही किसी कॉल पर सहमति दें. इसके बाद ग्राहक को बैंक को लिखित में यह जानकारी दे देनी चाहिए कि उसने कार्ड नहीं मांगा है और इसे तुरंत बंद किया जाए. लिखित शिकायत देने के बाद यह जिम्मेदारी बैंक की हो जाती है कि वह सात कार्य दिवसों के भीतर कार्ड को बंद कर दे. बंद करने के बाद वह SMS या ईमेल के माध्यम से ग्राहक को सूचित भी करता है.
बैंक एक्शन ना लो तब क्या करें?
अगर बैंक सात दिनों के भीतर कार्ड बंद नहीं करता, तो आरबीआई के नियम उसके खिलाफ और ज्यादा कठोर हो जाते हैं. बैंक को हर एक दिन की देरी पर ग्राहक को 500 रुपये का भुगतान करना अनिवार्य हो जाता है. इस तरह ग्राहक न सिर्फ सुरक्षित रहता है, बल्कि बैंक अपनी गलती के लिए आर्थिक रूप से जवाबदेह भी बन जाता है. कार्ड बंद होने की पुष्टि मिलने के बाद ग्राहक को उसे सुरक्षित तरीके से नष्ट कर देना चाहिए। कार्ड को नष्ट करने का सबसे सुरक्षित तरीका यह है कि उसे चिप वाले हिस्से सहित तिरछा काटा जाए और मैग्नेटिक स्ट्रिप को अलग-अलग टुकड़ों में काट दिया जाए.
बैंक देरी कर दे तो क्या करें?
अब सवाल उठता है कि अगर बैंक शिकायत को नजरअंदाज करे या देरी करे तो ग्राहक क्या करे. इस स्थिति में ग्राहक के पास सबसे महत्वपूर्ण हथियार RBI की Integrated Ombudsman Scheme है. इस योजना के तहत ग्राहक तीन परिस्थितियों में शिकायत दर्ज कर सकता है. अगर बैंक 30 दिनों तक जवाब न दे, अगर बैंक शिकायत को खारिज कर दे, या अगर ग्राहक समाधान से संतुष्ट न हो. ओंबड्समैन के पास शिकायत दर्ज करने पर मामला स्वतंत्र रूप से सुना जाता है और बैंक को इसके खिलाफ जवाब देना पड़ता है. कई मामलों में ओंबड्समैन ने सीधे बैंक को फटकार लगाई है और ग्राहकों को मुआवजा दिलवाया है.
अपने अधिकारो को जानना जरुरी
अंत में सबसे जरूरी बात यह है कि ग्राहक अपने अधिकारों को जाने और किसी भी दबाव में न आए. बिना अनुमति जारी हुआ क्रेडिट कार्ड ग्राहक की गलती नहीं होता, इसलिए किसी भी प्रकार का शुल्क देना उसकी जिम्मेदारी नहीं है. रिजर्व बैंक ने हर कदम पर ग्राहक की तरफ से सुरक्षा दी है. ऐसे मामलों में बैंक को जवाबदेह बनाना ही असल समाधान है. इसलिए अगर आपके साथ ऐसा हुआ है, तो शांत रहें, कार्ड को सक्रिय न करें, लिखित शिकायत भेजें और जरूरत पड़ने पर ओंबड्समैन का सहारा लें.
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