उत्तराखंड में मिला एक और ओम पर्वत! फिर से होने लगी इस रहस्य की चर्चा, जानिए क्यों

Uttarakhand: हिमालय में स्थित दो ओम पर्वतों की पहचान हो चुकी है, जहां बर्फ से ‘ॐ’ की आकृति बनती है. धार्मिक आस्था और प्राकृतिक रहस्य का अद्भुत संगम.

Uttarakhand: हिमालय में स्थित दो ओम पर्वतों की पहचान हो चुकी है, जहां बर्फ से ‘ॐ’ की आकृति बनती है. धार्मिक आस्था और प्राकृतिक रहस्य का अद्भुत संगम.

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Yashodhan Sharma
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Himalaya om parvat

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Uttarakhand News: हिमालयी क्षेत्र में धार्मिक ग्रंथों में वर्णित आठ ओम पर्वतों में से अब तक दो ओम पर्वतों की पहचान हो चुकी है. इन पर्वतों की खास बात यह है कि बर्फ जमने पर इनकी प्राकृतिक बनावट में ‘ॐ’ का स्पष्ट चिन्ह बनता है, जिसे धार्मिक दृष्टि से बेहद पवित्र माना जाता है.

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ब्यास घाटी में है पहला ओम पर्वत

पहला और सबसे प्रसिद्ध ओम पर्वत ब्यास घाटी में नावीढांग के पास स्थित है. बर्फबारी के मौसम में इस पर्वत पर बनने वाली ओम की आकृति दूर से ही साफ दिखाई देती है. यही कारण है कि यह स्थान श्रद्धालुओं, पर्यटकों और शोधकर्ताओं के बीच लगातार चर्चा का विषय बना रहता है.

दूसरा यहां है स्थित

दूसरा ओम पर्वत उत्तराखंड की दारमा घाटी में नागलिंग गांव के पास स्थित है. यह स्थान पुराने समय से ही धार्मिक आस्था का केंद्र रहा है. स्थानीय ग्रामीण पीढ़ियों से यहां पूजा-अर्चना करते आ रहे हैं. इस पर्वत की जड़ में नाग की आकृति बनी हुई है, जिसके कारण गांव का नाम नागलिंग पड़ा. यहीं से एक छोटी नदी निकलती है, जो आगे चलकर धौलीगंगा नदी में मिल जाती है. पर्वत के उत्तर दिशा में पंचाचूली पर्वत शृंखला स्थित है.

क्या कहते हैं स्थानीय लोग

स्थानीय लोगों का कहना है कि जब पर्वत पर बर्फ कम होती है, तब ओम की आकृति ज्यादा बड़ी और स्पष्ट दिखाई देती है. सालभर इस आकृति पर बर्फ बनी रहती है. भारी बर्फबारी के समय भी ओम नजर आता है, लेकिन उसका आकार छोटा दिखाई देता है.

नागलिंग गांव से करीब 150 मीटर की चढ़ाई के बाद हिमचुली का वयाशी बुग्याल आता है, जहां से ओम पर्वत साफ दिखाई देता है. सर्दियों में यह पूरा इलाका कई फीट बर्फ से ढका रहता है.

दिन में 7 बार सूर्य पहाड़ों के पीछे छिपता है सूर्य

इस क्षेत्र की एक और अनोखी बात यह है कि दारमा गांव में दिसंबर से अप्रैल के बीच दिन में सात बार सूर्य पहाड़ों के पीछे छिप जाता है. इसी वजह से ग्रामीण मानते हैं कि यहां सात बार सूर्योदय और सात बार सूर्यास्त होता है. इस अवधि में लोग निचली घाटियों में पलायन कर जाते हैं. विशेषज्ञों का मानना है कि बाकी बचे ओम पर्वतों की खोज के लिए वैज्ञानिक और भौगोलिक सर्वे की जरूरत है.

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