पंखुड़ियां, ठंडाई और भक्ति—दिल्ली में ब्रज की होली, 10 हज़ार श्रद्धालुओं के लिए बनाए गए विशाल पंडाल

3 और 4 मार्च को ISKCON Dwarka में ब्रज की परंपराओं से सजी एक विशेष दो दिवसीय होली मनाई जा रही है, जहां उत्सव, स्वाद और श्रद्धा एक साथ अनुभव होंगे.

3 और 4 मार्च को ISKCON Dwarka में ब्रज की परंपराओं से सजी एक विशेष दो दिवसीय होली मनाई जा रही है, जहां उत्सव, स्वाद और श्रद्धा एक साथ अनुभव होंगे.

author-image
Syyed Aamir Husain
New Update
holi 2026

holi 2026 Photograph: (ANI)

अगर ब्रज की होली को रंगों, खुशबू और भक्ति का संगम कहा जाता है, तो इस बार दिल्लीवासियों को वृंदावन जाने की ज़रूरत नहीं. 3 और 4 मार्च को ISKCON Dwarka में ब्रज की परंपराओं से सजी एक विशेष दो दिवसीय होली मनाई जा रही है, जहां उत्सव, स्वाद और श्रद्धा एक साथ अनुभव होंगे.

Advertisment

उत्सव की शुरुआत होती है गौर पूर्णिमा से

यह दिन है Chaitanya Mahaprabhu के प्राकट्य का, जिन्हें गौड़ीय वैष्णव परंपरा में भगवान श्रीकृष्ण का स्वर्ण अवतार माना जाता है. दिनभर कथा, संकीर्तन, अभिषेक और भोग अर्पण के साथ वातावरण भक्ति में सराबोर रहता है, जो होली की उल्लासपूर्ण शुरुआत की भूमिका बनाता है.

4 मार्च को मंदिर परिसर स्वयं ब्रज में बदल जाता है

लगभग 10 हज़ार श्रद्धालुओं के लिए बनाए गए विशाल पंडाल में फूलों की होली, लट्ठमार होली और मटका फोड़ जैसे पारंपरिक उत्सव मनाए जाते हैं. यहां होली का अर्थ है - रंग नहीं, बल्कि फूल.

फूलों की होली में आसमान से बरसती हैं गुलाब और गेंदा की पंखुड़ियां. हवा में घुली फूलों की खुशबू, चारों ओर गूंजते हरिनाम के कीर्तन और पैरों तले बिखरी पंखुड़ियां- यह अनुभव केवल देखा नहीं, महसूस किया जाता है. रासायनिक रंगों की जगह प्राकृतिक फूल, शरीर और पर्यावरण- दोनों के प्रति संवेदनशील उत्सव का संदेश देते हैं.

और होली बिना स्वाद के कैसी?

इस वर्ष का विशेष आकर्षण है- ब्रज शैली की 21 प्रकार की पारंपरिक ठंडाई. बड़े मिट्टी के बर्तनों में तैयार यह ठंडाई पहले भगवान को अर्पित की जाती है और फिर प्रसाद के रूप में भक्तों को दी जाती है. केसर, बादाम, पिस्ता, गुलाब, इलायची, मखाना, मिश्री और शहद -हर स्वाद में ब्रज की परंपरा घुली है.

इसके साथ ही भोग में शामिल हैं सात प्रकार की गुझिया 

खस्ता, सुगंधित और भरपूर स्वाद वाली, जो घर की होली की याद दिलाती हैं, लेकिन हज़ारों भक्तों के लिए तैयार की जाती हैं. इस विशाल आयोजन को सुचारु रूप से संचालित करने के लिए लगभग 2,000 स्वयंसेवक व्यवस्थाओं में जुटे रहते हैं, प्रशासन के साथ मिलकर भीड़ और सुविधाओं का ध्यान रखते हुए. हालाँकि संख्या बड़ी है, लेकिन भावना पूरी तरह व्यक्तिगत और आत्मीय बनी रहती है.

इस्कॉन द्वारका के बाली मुरारी दास ब्रह्मचारी कहते हैं 

“हमारे लिए होली और गौर पूर्णिमा केवल उत्सव नहीं, बल्कि भक्ति और सेवा का स्वरूप हैं. ठंडाई हो, गुझिया हो या फूलों की होली - हर चीज़ पहले भगवान को अर्पित की जाती है. साथ ही, हम यह भी सुनिश्चित करते हैं कि आधुनिक शहर में यह उत्सव स्वास्थ्य, पर्यावरण और सभी भक्तों की सुविधा को ध्यान में रखकर मनाया जाए.”

शाम का कार्यक्रम और भी विशेष हो जाता है जब अमेरिका से पधारी Gaur Mani Mataji, जो ग्रैमी-नॉमिनेटेड हैं, अपने भक्ति कीर्तन से वातावरण को आध्यात्मिक ऊँचाई पर ले जाती हैं. जहां आज की होली अक्सर सीमित कॉलोनियों या व्यावसायिक पार्टियों तक सिमट गई है, वहीं इस्कॉन द्वारका की यह होली एक अलग अनुभव देती है. जहां रंगों की जगह पंखुड़ियाँ हैं, नवीन ड्रिंक्स की जगह पारंपरिक ठंडाई है, और उत्सव पूरी तरह आस्था से जुड़ा हुआ है. फूलों की वर्षा, ठंडाई की सुगंध और गुझिया की मिठास के बीच, यह होली केवल देखने का उत्सव नहीं - बल्कि साझा अनुभूति है- ब्रज की आत्मा के साथ, राजधानी के हृदय में.

holi
Advertisment