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arvind kejriwal
आम आदमी पार्टी के दिल्ली प्रदेश अध्यक्ष सौरभ भारद्वाज ने गुरुवार को एक प्रेस कॉन्फ्रेंस में दावा किया कि दिल्ली की जनता को एक साल में ही केजरीवाल याद आने लगी है. दरअसल, दिल्ली सरकार को एक साल पूरे हो चुके हैं. इस मौके पर सौरभ भारद्वाज ने कहा कि यह वही दिल्ली है, जिसने 2025 से पहले आम आदमी पार्टी की सरकार के दौरान शिक्षा, स्वास्थ्य और बिजली-पानी के क्षेत्र में बदलाव का मॉडल देखा था. मोहल्ला क्लीनिक गरीब और मध्यम वर्ग के लिए सहारा थे. सरकारी स्कूलों के रिजल्ट और इंफ्रास्ट्रक्चर की चर्चा देश-विदेश तक होती थी. बिजली के बिल कम आए, पानी की सप्लाई बेहतर हुई. आम आदमी को लगा कि सरकार उसके दरवाजे तक आई है.
सीधे जनता की भावना से जुड़ता है
सौरभ भारद्वाज का दावा है कि अब एक वर्ष में हालात बदल गए हैं. शहर में होर्डिंग लगे, “एक साल, दिल्ली बेहाल, याद आ रहे केजरीवाल” तो उनमें किसी का फोटो नहीं था. सिर्फ एक संदेश था, जो सीधे जनता की भावना से जुड़ता है. सवाल यह है कि अगर सब कुछ ठीक है तो फिर नाम से डर कैसा?
शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं
सौरभ भारद्वाज कहा कि आज दिल्ली की गलियों में लोग पूछ रहे हैं, मोहल्ला क्लीनिक क्यों बंद या सुस्त पड़े हैं? सरकारी अस्पतालों में लाइनें लंबी क्यों हो गईं? स्कूलों में वही ऊर्जा और सुधार क्यों नहीं दिख रहा? सड़कों पर जाम अब सामान्य बात बन चुकी है. प्रदूषण का स्तर कम होने के बजाय कई बार और बढ़ जाता है. कई इलाकों से पानी न आने और सफाई व्यवस्था ढीली होने की शिकायतें लगातार सामने आ रही हैं.
फरवरी 2025 से पहले की सरकार में अरविंद केजरीवाल का नाम हर घर में एक ऐसे नेता के रूप में लिया जाता था, जिसने राजनीति की भाषा बदली. उन्होंने “वोट” के बदले “काम” की बात की. स्कूल ठीक हुए, क्लीनिक खुले, बिजली-पानी में राहत मिली. यही वजह है कि आज जब शहर में परेशानी बढ़ती दिखती है, तो लोगों को पुराना दौर याद आता है.
सड़क पर घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है
सौरभ भारद्वाज ने कहा, दिल्ली की जनता भावनाओं से ज्यादा अपने रोजमर्रा के अनुभव से फैसला करती है. अगर सुबह घर में पानी नहीं आता, बच्चा सरकारी स्कूल में पहले जैसा माहौल नहीं पाता, क्लीनिक में डॉक्टर नहीं मिलता, सड़क पर घंटों जाम में फंसे रहना पड़ता है, तो नाराजगी स्वाभाविक है. यही नाराजगी अब होर्डिंग्स और चर्चाओं में झलक रही है. एक साल के शासन का मतलब सिर्फ सत्ता में बने रहना नहीं होता, बल्कि यह साबित करना होता है कि जनता का जीवन बेहतर हुआ. अगर राजधानी की तस्वीर में सुधार के बजाय अव्यवस्था दिखे, तो सवाल उठेंगे ही. और जब सवाल उठते हैं, तो तुलना भी होती है, उस दौर से, जब लोगों को लगता था कि सरकार उनके लिए काम कर रही है.
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